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शहर में कहर बनकर टूट रहा काला धुआं-राख, कालिख और दर्द में जिंदगी बिता रहे लोग

प्रदूषण की कालिख ने शहर की एक बड़ी आबादी को प्रभावित किया है

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kabir nagar

शहर में कहर बनकर टूट रहा काला धुआं-राख, कालिख और दर्द में जिंदगी बिता रहे लोग

रायपुर. प्रदूषण की कालिख ने शहर की एक बड़ी आबादी को प्रभावित किया है। हीरापुर-कबीर नगर, उरला, सिलतरा, सांकरा आदि इलाकों के आसपास की फैक्ट्रियों के काला धुआं कहर बनकर टूट रहा है। कारखानों से निकलने वाली काली डस्ट की मोटी परत छतों पर पसर जा रही है। कालिख का खौफ इतना है कि इन क्षेत्रों के लोग छतों पर जाना तो दूर कपड़ा, गेहूं और बड़ी सुखाने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

प्रदूषण की कहर से घबराए लोगों ने इलाकों में रहना भी छोड़ दिया है। यहां के मकान बेचकर दूसरे जगहों पर बस गए हैं। अस्थमा व उम्र दराज लोगों की सांस फूलने की समस्या दोगुना बढ़ गई है। इसकी बड़ी वजह औद्योगिक प्रदूषण है। लोगों ने इन क्षेत्रों में मकान तो खरीद लिए, लेकिन ना तो दरवाजा खोलकर चैन की सांसें ले पा रहे हैं और ना ही छतों पर जाने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं। सुबह उठकर देखते ही आंखें फटी की फटी रह जाती हैं, छतों पर कालिख की मोटी परत ही दिखाई देती है।

लोगों का दर्द, उन्हीं की जुबानी
1. बसंत पटेल ने बताया कि उन्होंने कबीर नगर ब्लॉक क्रमांक 20 में मकान खरीदा था, उस मकान को अब बेचकर अहिवारा में जा कर बस गए हैं।
2. इसी ब्लाक के तीसरी लाइन में रहने वाले प्रशांत कुमार भी अपना मकान बेच चुके हैं। प्रशांत ने प्रदूषण के चलते सड्डू-मोवा में मकान खरीद लिया है।

देख लीजिए सुबह से राखड़ साफ करती हूं...
1. कबीर नगर की राखी मिश्रा ‘पत्रिका टीम’ को छत पर ले जाकर बोलीं, देख लीजिए राख की मोटी परत। सुबह इस राखड़ को साफ करती हूं और दोपहर तक इतनी फिर जम जाती है, ऐसे में छत पर जाना बंद कर दिए हैं।
2. इसी तरह अंजू देवी का कहना है कि घर में सांस लेना मुश्किल है। गेहंू अब नहीं धोते ना ही बड़ी बनाते हैं। अब कपड़ा भी छत पर सुखाना संभव नहीं है।

50 हजार से अधिक मकान चपेट में : हीरापुर, कबीर नगर, उरला, सिलतरा, सांकरा सहित आसपास क्षेत्रों को मिलाकर 1 लाख से अधिक मकान हैं, जिनसे साल-दर-साल टैक्स वसूला जाता है, लेकिन प्रदूषण की रोकथाम के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। यहां तक कि बरसात के दिनों पौधे लगाने का केवल खानापूर्ति साबित हो रही है। हीरापुर और कबीर नगर के उद्यान दूर से ही बदहाली बयां करती है।

एक्सपर्ट व्यू
श्वांस के मरीजों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक
ठं ड के दिनों में श्वांस रोगियों के लिए धुआं और धूल सबसे अधिक खतरनाक होता है। यह समस्या दो नहीं दस गुना बढ़ जाता है। फेफड़ा भी प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में जब घर से निकले तो मास्क लगाना ही एक मात्र उपाय है।
-डॉ. बीवी अहलूवालिया

पत्ते हो गए काले
सडक़ के किनारे जो छोटे-बड़े पौधे हैं, उन पत्तों का कोई भी हिस्सा साफ नजर नहीं आता। लोगों का कहना है कि ठंड के दिनों प्रदूषण का खतरा दो से तीन गुना और बढ़ जाती है, केवल गर्मी के दिनों में ही कुछ राहत महसूस करते हैं।

शरद पूर्णिमा में खीर रखना भी बंद किया: उरला, सिलतरा, कबीर नगर, सांकरा, हीरापुर आदि इलाकों में लोगों ने घरों की छतों पर शरद पूर्णिमा के दिन खीर रखना बंद कर दिया है। इस दिन का विशेष महत्व रहता है, जिसमें लोग खुले आसमान से नीचे खीर बनाते हैं, ताकि चंद्रमा से अमृत टपके, लेकिन काले धुएं की वजह से लोगों ने परंपरा बदल दी।
अब घरों के भीतर खीर रखे जाने लगे हैं।

मशीन पुरानी, वातावरण में 60 फीसदी कार्बन कण
औद्योगिक क्षेत्रों से सटे इलाकों में कार्बन कण की मात्रा 50 से 60 फीसदी है, जिसकी वजह से यहां घरों की छतों पर काली धूल की परतें जमा हो चुकी है। पं. रविशंकर शुक्ल विवि के रसायन विभाग के प्रो. डॉ. शम्स परवेज के मुताबिक आमतौर पर कार्बन पार्टिकल्स की मात्रा 2 से 3 फीसदी होनी चाहिए।

यह तभी संभव हो सकेगा जब उद्योगों में नई मशीनें लगाई जाएगी। कार्बन पार्टिकल्स की मात्रा अधिक होने की प्रमुख वजह उद्योगों में पुरानी मशीनों से उत्पादन है। औद्योगिक इलाकों में कोयले का उपयोग होता है। स्पंज आयरन आदि उद्योगों से निकलने वाले कार्बन पार्टिकल्स वायुमंडल के लिए ज्यादा खतरनाक है।

पर्यावरण विभाग के विशेष सचिव सुनील मिश्रा ने बताया कि ठंड के दिनों में वातावरण में नमी की वजह से फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं अधिक ऊंचाई पर नहीं जा पाता है। उद्योगों में मॉनिटरिंग सिस्टम लगाया गया है, जिसमें तय मानक से अधिक प्रदूषण होने पर विभाग को सूचना मिलती है, जिसके बाद उद्योगों को नोटिस जारी किया जाता है। बीते वर्षों के मुकाबले शहर में प्रदूषण कम हुआ है।