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यहां की इन चीजों के दीवाने हैं बॉलीवुड की हस्तियां, विदेशों से भी होती है डिमांड

जैविक खेती यानि नो-केमिकल। इस खेती से उपजे उत्पादों ने अब शहर के मॉल से लेकर बाजारों में जगह बना ली है।

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यहां की इन चीजों के दीवाने हैं बॉलीवुड की हस्तियां, विदेशों से भी होती है डिमांड

यही नहीं, स्थानीय एक्सपोर्टर के जरिए यह दिल्ली, मुंबई, बंगलुरू, हैदराबाद, पुणे में भी सप्लाई किया जा रहा है। बॉलीवुड के नामचीन हस्तियों के घरों में भी बिना केमिकल वाले छत्तीसगढ़ का जवांफूल, मोती चूर, दूबराज, बादशाह भोग के चावल पकाएं जा रहे हैं। राज्य सरकार ने भी जैविक खेती मिशन को बढ़ावा देने के लिए योजना की शुरुआत कर दी है। हालांकि राज्य सरकार ने बजट काफी कम रखा है, बावजूद इसके बाजार की डिमांड के मद्देनजर किसान खेती में रुचि ले रहे हैं।

फूल लगने के पहले घी-शहद का छिडक़ाव : रायपुर जिले के आरंग विकासखंड के ग्राम सेमरिया और कोसरंगी के किसानों ने बताया कि जैविक खेती में प्रशासन से वर्मी और नाडेफ खाद के लिए प्रोत्साहन राशि मिलती है, लेकिन यह काफी कमी है। वह अपनी तरफ से धान, गेहूं आदि में वैदिक पद्धति से पंचगव्य पदार्थ जैसे घी, शहद, गुड़ आदि का घोल तैयार करके फूल लगने के पहले छिडक़ाव करते हैं।

बीमारियां हो रही खत्म : बिना केमिकल वाले उत्पाद में ना केवल पर्याप्त मात्रा में खनिज होता है, बल्कि कई लोगों ने अनुभव शेयर किए कि बीमारियों को खत्म करने में भी ये बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

जैविक खेती करने वाले बस्तर के किसान राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि उनके प्रोडेक्ट हर्बल चाय, हल्दी, काली मिर्च आदि की डिमांड जर्मनी व हालैंड में भी है। बालोद जिले के किसान राजेश चौधरी ने बताया कि पुणे व अन्य शहरों के जरिए चावल की नई किस्मों की सप्लाई बॉलीवुड से लेकर देश के वैज्ञानिक और डॉक्टरों के बीच है। रायपुर जिले के ग्राम कोसरंगी के आलोक चौधरी ने बताया कि उन्होंने चावल, गेहूं, चना का जैविक उत्पाद जिला कलक्ट्रेट के काउंटर में लगाया है।

जवां फूल, जीराफूल, लोगटी माछी, मोती चूर, बादशाह भोग, एचएमटी, दूबराज, कोदो, कुटकी, कोसरा, ब्राउन राइस आदि।

जिले के अनुविभागीय कृषि अधिकारी दीपक नायक के मुताबिक ऐसा नहीं है कि जैविक खेती के नाम पर केमिकल युक्त चावल, गेहूं व अन्य उत्पाद बेचा जाए, बल्कि इस उत्पाद को नेशनल एक्रीडेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोट्ररी (एनएबीएल) से संबंद्ध जांच एजेंसी से सर्फिफाइड होना जरूरी है। खेतों में अधिकारियों की जांच के बाद प्रमाणीकरण किया जाता है। केंद्र सरकार के पीडीएस (पार्टिसिपेटरी गारंटी सिस्टम) के जरिए भी किसानों को जैविक खेती का प्रमाण-पत्र दिया जा रहा है।

किसानों की पीड़ा यह भी है कि सरकार ने जैविक खेती को प्रोत्साहन तो दिया है, लेकिन फसल तैयार होने के बाद सरकार की ओर से एक ऐसा प्लेटफॉर्म मिलना चाहिए, जिसके जरिए वह अपने उत्पादों को बेच सके। ब्रांडिंग की समस्या आ रही है, क्योंकि छोटे किसान एक्सपोर्टर से नहीं मिल पा रहा है।

कृषि संचालनालय के सहायक संचालक चंदन रॉय ने बताया कि जैविक खेती में सब्सिडी के लिए वित्तीय वर्ष 2018-19 में लक्ष्य 16650 एकड़ से बढ़ाकर 20 हजार एकड़ किया गया है, जिसके लिए लगभग 30 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया है। एक एकड़ में लगभग 10 हजार की अनुदान राशि दी जा रही है।