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कमलक्षेत्र में वर्षों से प्रचलित है पंचकोशी परिक्रमा की परंपरा

ऑनलाइन हुई साहित्यिक परिचर्चा

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कमलक्षेत्र में वर्षों से प्रचलित है पंचकोशी परिक्रमा की परंपरा

कमलक्षेत्र में वर्षों से प्रचलित है पंचकोशी परिक्रमा की परंपरा

पांडुका। जिला रत्नांचल साहित्य परिषद द्वारा कमलक्षेत्र में पंचकोशी परिक्रमा की परंपरा विषय पर ऑनलाइन साहित्यिक परिचर्चा का कार्यक्रम संपन्न हुअ। जिसने लेखकों ने पंचकोशी परिक्रमा विषयक अपनी बात रखी। कवि व साहित्यकार संतोष कुमार सोनकर मंडल ने कहा कि धर्म नगरी राजिम से वर्षों से चली आ रही पंचकोशी परिक्रमा की परंपरा एकता, भाईचारा व धर्म की ओर उन्मुख करता है। पौष मास में यह यात्रा प्रतिवर्ष की जाती है, जिसमें पांच शिवपीठ की यात्रा एक सप्ताह में पूरी होती है। पूरे भारतवर्ष में पंचकोशी शिव पीठ की परिक्रमा का अनुष्ठान राजिम में होता है। यह अपने आप में विलक्षण उदाहरण है। बिना सरकारी सहयोग व तामझाम के लोग स्वत: इस यात्रा को अपनी रोजमर्रा के सामानों को सिर पर लादकर पूरी करते हैं। यह लोगों की आस्था व भक्ति को प्रगाढ़ करती है। श्रीमद्भाजीवलोचनमहात्तम के अनुसार पांचों शिवपीठ कमल पुष्प के पांच पंखुड़ी पर स्थित है, जिसकी परिक्रमा अत्यंत दुर्लभ बताया गया है। लेखक वेदप्रकाश नागरची ने कहा कि पंचकोशी यात्रा की शुरुआत राजा जगतपाल ने किया था। भगवान विष्णु ने राजा को सपने पर कहा कि पंचकोशी परिक्रमा करने से मुक्ति मिलती है। उन्होंने घोड़े पर सवार होकर सभी शिवपीठों की परिक्रमा की। इससे देव प्रसन्न नहीं हुए और फिर उन्हें सपने में बताया कि आपने पांव से चलकर यात्रा पूरी नहीं की, जबकि घोड़े ने पूरा किया है। इसलिए सब पुण्य घोड़े को मिल गया। अगली बार राजा ने खुद से चलकर यात्रा पूरी की। कूर्मपुराण में पैदल यात्रा को श्रेष्ठ बताया गया है। यह पंचकोशी परिक्रमा पैदल बिना चरण पादुका के किया जाता है।
गीतकार टीकमचंद सेन ने कहा कि छत्तीसगढ़ का प्रयाग कई विविधताओं से भरा हुआ है। यहां न सिर्फ तीन नदियों का संगम है, बल्कि धर्म, अध्यात्म व संस्कृति का त्रिवेणी संगम भी उजागर है। वनवासकाल के दौरान महर्षि लोमश से मिलने त्रेतायुग में रामचंद्र ने पैदल चलते हुए राजिम पहुंचे। तब सीता ने अपने हाथों से रेत से शिवलिंग का निर्माण किया जो कुलेश्वरनाथ महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने शिवलिंग पर त्रिवेणी के जल से अभिषेक किया, जो पांच ओर से बह गया। इस तरह यह पंचमुखी शिवलिंग कहलाएं। विश्व के गिनी चुनी स्थानों में पंचमुखी शिवलिंग के दर्शन होते हैं।
युवा साहित्यकार पुरुषोत्तम चक्रधारी ने कहा कि पंचकोशी यात्रा के मूल में भगवान राजीवलोचन व कुलेश्वरनाथ महादेव विराजमान है, उनके बाद पांच शिवपीठों में पटेवा में पटेश्वरनाथ महादेव, चंपारण में चंपकेश्वरनाथ महादेव, बम्हनी में ब्रह्मकेश्वरनाथ महादेव, फिंगेश्वर में फणीकेश्वरनाथ महादेव, कोपरा में कर्पूरेश्वरनाथ महादेव है। उन्होंने बताया कि राजिम के सीताबाड़ी में उत्खनन किया गया है, जिसमें सम्राट अशोक के काल के विष्णु मंदिर व कई मूर्तियां सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी हुई हैं, जो नगर की प्राचीनता को उजागर करती है।