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बोडक़ी में पारंपरिक बेलन से धान मिंजाई

आधुनिक तकनीक ने खेती के पारंपरिक साधनों को कर दिया दूर

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बोडक़ी में पारंपरिक बेलन से धान मिंजाई

बोडक़ी में पारंपरिक बेलन से धान मिंजाई

छुईहा बेलर। छत्तीसगढ़ में पारम्परिक बेलन से धान मिंजाई करना बहुत प्रसिद्ध था। बोडक़ी ग्राम के किसान धनजी साहू आज भी मिंजाई का कुछ अंश बेलन से करते आ रहे हैं। धान मिंजाई का यह तरीका अधिक कारगर है, क्योंकि बेलन से धान बहुत जल्दी अलग हो जाता है।
पैरा जलाकर काली राख की रेखा बनाई जाती है। जिससे किसानों का विश्वास है कि यह टोटका बुरी शक्तियों कुदृष्टि से उनकी फसलों को बताएगा। अब थ्रेसर मशीन, हार्वेस्टर ने तो धान मिंजाई व उड़ाने का झंझट ही खत्म कर दिया। किसान ने कहा कि आधुनिकता ने हमारा सुन्दर और सुनहरा कल छीन लिया। वर्तमान में आधुनिकता विज्ञान टेक्नोलॉजी और इक्कीसवीं सदी का प्रभाव जीवन के हर कार्यों में काफी बदलाव अवश्य आया है, किन्तु कई क्षेत्रों में ग्रामीण आज भी पारंपरिक विधि से कृषि को अपनाएं हुए हैं। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण छुईहा से 3 किलोमीटर दूर ग्राम फुलझर बोडक़ी निवासी लघु किसान धनजी साहू हैं, जो आज भी धान मिंसाई का काम लकड़ी से निर्मित बेलन तथा बैल से कर रहे है। पारंपरिक विधि से किसानी करते हुए अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं। लेकिन जरूरी काम को जल्दी निपटाने तथा सुविधाजनक बनाने तकनीकि सुविधा मानव जीवन के लिए वरदान है। वहीं, छत्तीसगढ़ी संस्कृति में कई कार्य पारंपरिक विधि से करने पर अत्यंत सुखदायक अनूभूति प्रदान करता है।
बता दें कि मात्र तीन दशक पूर्व कृषि का सभी कार्य पुरानी पद्धति से निपटाया जाता रहा है। जैसे हल द्वारा जोताई, रोपाई, गुड़ाई ,कटाई, मि,साई, उड़ाई तथा बैलगाड़ी द्वारा ढुलाई, ब्यारा में विविध प्रकार से रस्में करना आदि कार्य समय अनुसार हुआ करता था।