
अधिया अउ रेगहा
छत्तीसगढ़ म एक संघरा खेती करे के रिवाज हे, तेला अधिया कहिथे। खेत के मालिक ह अपन खेत ल कोनो कमइया किसान ल फसल बोये बर सुनता-सलाह करके दे देथे। ये एक बछर बर होथे। फेर जादा बछर बर घलो हो सकत हे, तेला कट्टू कहिथें। अधिया म बोअइया किसान ह फसल लेके सबो खरचा ल उठाथे। मालिक ल कुछ खरचा दे बर नइ पडय़। अधिया बोअइयामन ल अधियारा कहे जाथे। खेत के जोतई, बोवई, निंदई, बियासी, रोपा, लुआई, मिंजाई सबे के खरचा ल अधियारा उठाथे। कभु-कभु मालिक ह घलो पहली ले आधा खरचा ल दे देथे। नइते फसल ले के बाद दूनों के बीच म खरचा के आधा-आधा हिसाब हो जथे। तहां ले फसल ले मिले अनाज ल आधा-आधा बांटे जाथे।
अधिया के तरीका म मालिक अउ अधियारा दूनों झन-बर सुभित्ता हे। काबर कि जमीन के मालिक बो नइ सकय त खेत ह पड़ती परे ले बांच जथे। अउ अधियारा ल अपन जिनगी के गुजर-बसर करे के साधन मिल जाथे। ऐहा खाली मालिक अउ अधियारा के लाभ नोहे, बल्किन देस अउ समाज ल घलो फायदा पहुंचाथे। काबर कि पड़ती जमीन के उपयोग करे से देस के अनाज भंडार ह बाढ़थे। अधियारा के काम ल खाली वसुंधरा (भूमिहीन) मन नइ लेेवें, बल्किन पो_ किसान जउन ह जादा खेती कर सकथे उहूमन अधिया लेथें।
गांव के कईझन रोजी-मजूरी के काम ल नइ करके अधिया ले के बुता करथे। अपन मेहनत ल जमीन म लगा के गुजर-बसर करथे। गांव म छोट-मोट नौकरी करइया करमचारीमन घलो अधिया लेथें। जइसे मास्टर, ग्राम सेवक, पटवारीमन घलो अधिया लेथे। वोमन ल अपन काम के बाद अउ काम करे बर समे मिलथे। त वो समे ल अधिया म गुजारथे। गांव म सहर जइसे घूमे-फिरे के जगा नइ होवय। सहर म घूमे-फिरे, आय-जाय म बहुत समे लाग जाथे। गांव म बांचथे समे ल करमचारीमन अधिय- रेगहा ले के खेती काम म लगाथे। सहर म समे गुजारे के बहुत जरिया हे। गांव म समे गुजारे बर खेती के काम बहुंत अच्छा होथे। ऐकरे सेती गांव म नौकरी करइयामन संगे-संग अधिया-रेगहा के बुता करथे। ऐकर से वोमन अपन बछरभर के अनाज के खरचा ल बचा लेथे। कईझन तो अच्छा आमदनी लेके खेत-खार तको बना लेथे।
अधिया के छोड़ रेगहा घलो होथे। रेगहा एक परकार ले ठेका आय। रेगहा म आधा-आधा बांटा नइ होवय। ऐमा खेती के जमीन के एक बछर के ठेका होथे। एकड़ पाछू अनाज या रुपया के करार होथे। रेगहा म जमीन के मालिक बर बड़ सुभित्ता होथे। काबर कि फसल होय चाहे, झन होय, जमीन के मालिक ल करार के मुताबिक अनाज या रुपया दे जाथे। अधिया म जोखिम रहिथे। फसल बरोबर नइ होय ले मालिक ल नुकसान होथे। फेर रेगहा म करार के पइसा या अनाज ल देच बर परथे।
पहली सबे किसानमन अपन खेत ल खुदे बोवत रिहिन हे। फेर, धीरे-धीरे अधिया अउ रेगहा के तरीका ल अड़बड़झन अपनाय लगिन। कईझन पो_ किसानमन सहर म रेहे लगिन, त वोमन अपन खेत ल अधिया-रेगहा म देके सहर म मजा करथें।
कुछ बछर पहली सरकार हर नियम बना दे रिहिस कि दूसर के जमीन म सरलग कई बछर ले खेती करइया अधियारा या रेगहा वालामन ह मालिक के जमीन म काबिज हो सकथे। फेर, गांव म अइसन नीयतखोर कमेच होथे। तभो ले कुछ इंसानमन अइसन कर सकथें। ते पाय के अधिया दे बर कईझन मालिकमन डरथे। तेकरे सेती आजकल लिखित म करार होथे। पहली नइ होत रिहिस। फेर, अब सावधानी बरते जाथे, अउ ऐके बछर बर करार होथे। दू-तीन बछर म अधियारा ल बदल दे जाथे।
कतकोन मजदूरमन काम-बुता के तलास म बड़ दूरिहा कमाय-खाय बर जाथे। त दूसर कोती कतकोन मेहनती कमइयामन ह अधिया-रेगहा ले के अपन गांवेच म गुजर-बसर करथें। कईझन तो अधिया-रेगहा के आमदनी ले खेत-खार खरीद डरे हे, अउ बड़का किसान जइसन हो गे हे। खुदे के जमीन म फसल लेवत हें। तभो अधिया लेतेच रहिथे। अधिया अउ रेगहा एक अइसे इंतजाम हे, जेला अंग्रेजी म 'वर्किंग पार्टनरÓ कहिथें। अधिया-रेगहा ले रोजगार के मउका बढ़थे।
Published on:
27 Apr 2020 04:45 pm
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