
‘हाना’ जिनगी के गाना
छत्तीसगढ़ के जाने- माने साहित्यकार ए डॉ. रमाकांत सोनी ह। हाना: जिनगी के गाना उंकर नौंवी किताब आय। जेमा एक हजार एक सौ एक से जियादा छत्तीसगढ़ी के हाना हवय। हाना : जिनगी के गाना किताब ह बड़ मिहनत अउ अनुभव के निचोड़ आय। अभु के बेरा म लइकामन अंगरेजी भासा के मोह म अपन भासा अउ संस्करीति ले दूरिहा होत जावत हे। अइसन म वोमन के गियान अउ जानकारी बर हाना : जिनगी के गाना किताब बहुतेच सुघ्घर हावय। सोधारथीन बर ये किताब एक परकास स्तम्भ हे।
गोठ बात करत समे हाना, लोकोक्ति या मुहावरा के परयोग ह गोठ बात के सुंदरता ल बढ़ाथे अउ सुनइयामन ऊपर अपन गहरा परभाव छोड़थे। ऐकर बर हाना वाक्य म बउरना जरूरी हो जाथे। अइसने हानामन ल सकेल अउ संजो के डॉ. रमाकांत सोनी ह अपन पाठकमन ल परोसे हवय। अपन कथ्य म रमाकांतजी ह हाना के महत्व, लोकोक्ति, मुहावरा म अंतर, लोकोक्ति अउ सूक्ति म अंतर, हाना अउ जनऊला म अंतर अउ लोकोक्ति के वरगीकरनमन ल बिस्तार ले बताए हे। हाना :जिनगी के गाना किताब म डॉ. रमाकांत ह अनुकरम ल सुघ्घर ढंग ले बांटे हावय। जइसे - पद्वयात्मक- ऐमा 230 कवितामय हाना हे। ‘बोल अइसन कि कोई चुप झन कहय। बइठ अइसन कि कोहू घुंच झन कहय।’
करम भाग्य ऊपर हानामन हे। ‘टूटहा करम के फूटहा दोना। झोर गवावय चारो कोना।’ अइसन कतको ठिंन बिसय के हानामन ह ये किताब म सकलाय हे। जइसे-सास, ससुरार, घरजिंया दामाद, मुफ्तखोर, कामचोर, लबारा झूठा, अंग बिसेस, जाति बिसेस हाना हे। हाना : जिनगी के गाना म रंग-रंग के आनी-बानी के हाना हावय। जेला पढ़ के बड़ खुसी होथे। सहिच म ये किताब म डॉ. रमाकांत के मेहनत अउ लगन के फल आय। ये किताब उंकर दस बछर के परयास आय। हाना : जिनगी के गाना ल लिख के डॉ. रमाकांत सोनी ह छत्तीसगढ़ी के साहित्य भंडार ल भरे हावय।
Published on:
29 Nov 2021 05:26 pm
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