
टमाटर की खेती से उकताए किसान चुनाव में सरकार से मांग रहे अपनी बेबसी का जवाब
रायपुर. महामाया की नगरी साजा। कांग्रेस के दिग्गज नेता रविन्द्र चौबे के परिवार का गढ़ रहा है। यहां पिछले तीन दशक से लगातार चौबे परिवार के सदस्य ही विधायक चुने गए। पहली बार 2013 के चुनाव में लगातार पांच बार साजा विधानसभा क्षेत्र से विजयी रहे रविन्द्र चौबे को हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा के कार्यकर्ताओं ने पहली बार लाभचंद बाफना के साथ जीत का स्वाद चखा है। इस बार भी यहां का चुनावी मुकाबला दिलचस्प होने वाला है। भाजपा जहां जीत के क्रम को कायम रखने मैदान पर उतर गई है। पढि़ए साजा से ताराचंद सिन्हा की खास रिपोर्ट।
वहीं हार कर सामना कर चुके कांग्रेस जीत के लिए पूरा दमखम लगाएगी। राजनीतिक गलियारे की इस दावपेंच जानने हम विधानसभा क्षेत्र के गांवों में पहुंचे। जहां लोगों के बीच राजनीति के साथ खेती किसानी की समस्या का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। किसान, सिंचाई और अपने उत्पाद का उचित कीमत नहीं मिलने पर खासे नाराज हैं। वहीं युवा स्कूल, कॉलेज में पढ़ाई की प्रॉपर सुविधा नहीं होने की वजह परेशान हैं।
शिवनाथ व आमनेर नदी के किनारे बसे छोटे-छोटे गांव सुखरी, खिलोरा, डोड़की, शिवकोकड़ी, भाठा कोकड़ी, छोटे तुमा, बड़े तुमा, राजपुर, पगबंधी, अगार, पेंड्रावन, हीरेतरा, गोरपा, भिलौरी, कोनका है। जहां की मिट्टी में लाल सोना (टमाटर) की खेती ने कभी अन्नदाताओं के लिए खुशहाली का संदेश लेकर आया था। उसी लाल सोना ने उनके चेहरे की खुशी छीन लिया है।
यहां की टमाटर पहले की तरह की प्रदेश के बाहर मुंबई, दिल्ली, गुजरात, नासिक, पुणे नहीं भेज पा रहे हैं। ट्रांसपोर्ट का खर्च अधिक है। बाजार में उत्पाद की अच्छी कीमत नहीं है। पिछले साल टमाटर को सड़क पर फेंकना भी पड़ा था। इस वजह से कई अन्नदाताओं ने इस साल बागवानी की खेती बंद कर दिया है।
दुर्ग-धमधा रोड से 3-4 किलोमीटर खिलोरा में हमारी मुलाकात संजय वर्मा से हो गई। खेती-किसानी का हाल पूछने पर वह फूट पड़ा। उन्होंने कहा कि सात साल पहले जिस टमाटर की खेती ने गांव में किसानों के लिए खुशहाली का संदेश लेकर आया करता था। आज उसी टमाटर ने उनके चेहरे की खुशी छीन लिया है।
परत दर परत एक-एक हजार रुपए की एक लीटर की दवा का छिड़काव, 150 रुपए प्रतिदिन की मजदूरी और फिर गांव से शहर तक ले जाने का परिवहन खर्च। और मंडी में उत्पाद की कीमत नहीं। जो किसान ढाई एकड़ जमीन पर 10 लाख से ज्यादा टमाटर बेचकर डेढ़ से दो लाख तक मुनाफा कमा लेते थे।
इस साल किसान उतनी राशि का कर्जदार हो जाएगा। मंडी में 5-6 रुपए किलो टमाटर बिक रहा है। इस कीमत पर मजदूरी, दवाई और परिवहन का खर्च निकालना मुश्किल हो गया है। मजदूरी अनाज बेचकर देना पड़ रहा है।
मांग की जा चुकी है
ग्राम ठेंगागुडी के ग्रामीण सुभाष, अजय, संदीप, रुकमण, भरत प्रधान ने बताया कि तीन सौ से अधिक गांव में मतदाता होने के बाद भी मतदान केन्द्र नहीं बनाया जा रहा है। जबकि कई बार लिखित में मांग की जा चुकी है। कच्ची सड़क होने के साथ ही लम्बी दूरी के कारण बुजुर्ग व नई नवेली बहुएं मतदान के लिए जाना पसंद नहीं करतीं।
परेशानी होती है
पदूम डनसेना, विजय पटेल, गजानंद सिदार ग्राम छेलफोरा का कहना है कि मतदान केन्द्र नहीं होने की पीड़ा खासकर बुजुर्ग व दिव्यांग मतदाताओं को होती है। क्योंकि मतदान केन्द्र तक जाने के लिए उबड़-खाबड़ कच्चा रास्ता और नाला पार करना काफी दुर्गम है। वहीं साधन विहिन मतदाताओं से भी परेशानी होती है।
सिर्फ नाम का रह गया है सुरही
साजा की आगे बढ़े तो माता संतोषी की दरबार में बैठे रोमेन्द्र सिंह ठाकुर, व्यंकटेश सोनी, चंद्र कुमार सिहोरे, उमेश अग्रवाल सयुंक्त रूप से कहना है कि यहां विकास नहीं,देवकर की जीवनदायिनी सुरही नदी का विनाश कर रहे हैं। घरों की गदंगी नदी में बहा रहे हैं। इस वजह से सुरही भी रूठ गई। पांच साल पहले तक भांवर घाट से लेकर डेहरी तक नदी में 12 महीने धार बहती थी। वही सुरही नदी दिसंबर-जनवरी के बाद सूख जाती है। पांच हजार की आबादी वाले इस कस्बा में धार्मिक कार्यक्रम के लिए पानी के लाले पड़ जाते हैं।
आबोहवा हो गई खराब
सहसपुर के मुरलीधर सिन्हा का कहना है कि लालपुर में मुर्गी फार्म क्या खुला। फार्म हाउस से 20 किलोमीटर के आसपास की गांवों की आबोहवा की खराब हो गई। मुर्गी फार्म हाउस की वजह से आम लोग बीमार रहे हैं। फसल और जानवरों के लिए मक्खियां मुसीबत बन गई है। सब्जी, भाजी की फसलों पर बड़ी-बड़ी मक्खियां भिनभिनाते रहती हैं। पिछले साल कई गांव संक्रमित बीमारी की चपेट में आ गई थी।
कुछ भी तो नहीं बदला...
परिसीमन के बाद धमधा विधानसभा क्षेत्र को विलोपित कर अहिवारा और साजा विधानसभा क्षेत्र के बीच गांवों की सीमा रेखा भले ही बदल गई। क्षेत्र में कोई बदलाव नहीं हुआ। जमीन सिंचाई के लिए तरस रहा है। नुकसान से परेशान नौजवान खेती छोड़ गांव से शहर की ओर पलायन कर रहे हैं।
डोड़की, अगार, कोनका, सन डोंगरी, साल्हे, सनपुरी, सहसपुर, लालपुर, खुरुसबोड़, जामगांव, कोहकाबोड़, लोधी खपरी, सुरुजपुरा जैसे कई गांव हैं, जहां सीधे परिवहन की सुविधा नहीं है। बस पकडऩे के लिए 5 किलोमीटर दूर चलना पड़ता है।
तीन महाविद्यालय हैं। जहां युवाओं को बीए, बीएससी की पढ़ाई के लिए 20-22 किमी की दूरी तय करना पड़ता है। प्राध्यापक नहीं है। युवा गांव छोड़कर शहर पहुंचते हैं तो प्रतिशत कम होने की वजह से शासकीय और निजी महाविद्यालयों में प्रवेश नहीं मिल पाता।
धमधा विकासखंड में ऐसे 22 गांव हैं, जहां के बच्चों को 11वीं की पढ़ाई करने के लिए 5-6 किलोमीटर की दूरी तय करना पड़ता है।
Updated on:
16 Nov 2018 07:19 pm
Published on:
16 Nov 2018 07:17 pm
