
रायपुर . छत्तीसगढ़ के संस्करीति अउ परंपरा बिकट जुन्ना हे। नबरात म देबी के नवठन रूप के बखान होथे। हमर गांव-गंवई म मानता हावय कि सक्ति के देवी दुरगा ह नवदिन म नव रूप म दरसन देथे। इही पायके दुरगा सरोत अउ दुरगा सप्तसती म बखान हावे कि - दाई तोर महिमा ह अपार हावय। तेंहा तो भगवान परसुराम के माता हरस। तोर सुंदरता अउ सिंगार के कइसे मेहा बखान करंव। तोर अंग म मुक्ताहार अउ वस्त्राभूसन बने सुग्घर लागत हावय। माथ म कस्तूरी तिलक अउ सेंदुर लगे हावय। दाई तेंहा अपन भगत के दुख ल हरइया हरस। दाई तोला मेहा दीप, धूप, नैवेद्य चढ़ात हंव। मोर बिनती ल सुन ले दाई अउ तेंहा जग के कलयान कर।
अइसने मानता के संग चइत नवरात म छत्तीसगढ़ के गांव-गंवई के सीतला मंदिर के जंवारा संग दाई के दरबार ह सजथे। जम्मो दाई के अपन-अपन बड़भाग हवय। फे र आदिसक्ति मां जगदंबा के कल्पना भर ले छत्तीसगढ़ के जम्मोमन के हिरदे म सक्ति अउ भगती के गंगा ह बोहाय लगथे। कोनो ह माता सेवा गाथे, कोनो ह जोत-जंवारा के सेवा म अपन अंतस ल लगा देथे। कोनो ल देवता चघ जथे, त कोनो दाई के अंगना म अपन मानता बर बहुचेत दूरिहा ले बिगर भंदई के पहुंचथे।
नवरात के तिहार म नव संख्या के बड़ महत्व हावय। चइत महीना के नवरात म दुरगा दाई ह नव रूप म अपन भगतमन ल दरसन देथे। दाई के नौ रूप हावे - सैल पुतरी, बरम्हचारिनी, विंध्यवासिनी, कमांडा, स्कंदमाता, कात्यानी, कालरातरी, महागौरी अउ सिद्धरातरी के रूप म परगट होथे। दाई ह अलग-अलग दिन अलग-अलग रंग के लुगरा ल ओरी-पारी लाली, पिंवरा, हरियर, गुलाबी, केसरिया, छिटही, सफ ेदहा, करिया पहिरथे।
सीतला मंदिर के बइगा ह वोसनेच रंग के धजा ल दाई के अंगना का टांग देथे। जोत अउ दाई के सिंगार म जेने-जेने जिनिस लागथे। जोत ल जलाय बर करसा, कलौरी, दीया, कुडेरा ह कुम्हार घर ले आथे। तेली के घर ले तेल, पटवा के घर ले दाई के सिंगार अउ चुड़ी-चाकी, कंडरा के घर ले झेंझरी, टुकनी आथे। राउत के घर ले गोरसी, बइगा के घर ले लिमउ, कोस्ठा के घर ले लुगरा, बनिया के घर ले नरियर, हूंम, माली के घर ले फूल लाय जाथे।
ऐकर कहे के मतलब हावय कि गंवई म सब्बो के घर ले कुछु न कुछ सामान आथे, तेकर ले दाई के सिंगार अउ पूजा करे जाथे। नवरात के ठउका एक दिन पहिली पांच पंच अउ गंवई के बइगा ह नइते पंडा ह जंउ, तिली, धान, कोदो, कुटकी, सरसों, मूंग, चना अउ गहूं जइसन नव परकार के अनाज ल माटी के कुंडेरा म फि जो देथे। दूसरइया दिन पूजा-पाठ के संगे-संग कुम्हार के माटी अउ राख ल मिलाके झेंझरी अउ नवठिक दोना म जंवारा ल बोए जाथे। जंवारा ल बोंए के संगे-संग दाई के मूरति अउ जोत ल नउ दिन बर बार दे जाथे। इही बेरा म पांच पंच अउ गंवई के बइगा, नइ त पंडा ह हूम देके अउ पूजा-पाठ करके दाई के सेवा जतन म लग जाथे।
गंवई-गांव के मनखेमन अपन-अपन सक्ति के हिसाब ले घी, डालडा नइ त तेल के जोत ल जलवाथे। चकमक पथरा के आगी ले जोत जलाय जाथे। जोत के करसा के भीतर मा नव ठन हरदी, नव ठन सुपारी, नवठन बंगला पान, नव ठन लोंग, नवठन लायची, अउ सिक्का ल डारे जाथे। पंाचे अउ साते के दिन दाई के करसा के उप्पर म फू लकांस के लोटा रख के जोत के उप्पर म नरियर अउ चाउर रखे जाथे। सुरूच दिन ले छोकरा जात अउ छोकरी जातमन ह माता सेवा ल गाथे। साते के दिन माई करसा के उप्पर म दूसरा करसा मढ़ाय जाथे। अतिक दिन तक ले जंवारा ह बने हरियर-हरियर बाढ़ जाथे।
आठे के दिन जम्मो गांव के मन ह दाई के अंगना म सकलाथें। इही दिन हूमन घलो करे जाथे। हूमन म धन पाय बर परसा, बैरी के नास बर चिड़चिड़ा, सरग बर बोईर, मानता बर मदार, सांति बर सेम्हर, लछमी दाई बर राहेर अउ आमा के लकड़ी ले हूमन करे जाथे। सब्बो कोई अग्रि देव मा सांखला डार के अपन-अपन मानता करथे। ऐकर बाद कन्या भोज कराए जाथे।
नम्मी के दिन बिहनिया ले नहा के सादा-सादा लुगरा पहिन के माइलोगिनमन ह जंवारा करसा ल अपन मुड़ी म बोह के लेन बना के गांव के तरिया डहर जाथें। रस्ताभर माता सेवा के धुन ल बजावत रहिथे। बैगा-गुनियामन नाचत रहिथे। तरिया पार म दाई के आरती-बाती करके जंवारा ल ठंडा कर देथे।
छत्तीसगढ़ म जंवारा दू तरीका ले बोयं जाथे। जम्मो गंवई के डहान ले सीतला मंदिर म, दूसर अपन घर म। जेन परिवार ह अपन घर म जंवारा बोथे, वोला जंवरहा या देवताहा कहे जाथे। अइसन घर म तीन, पांच या सात बछर म एक पइत जंवारा बोय जाथे। परिवार म बने बेरा के खुसी, नवा बहू आथे तब नइते कोनो मानता बर जंवारा बोय जाथे। मानता वाले जंवारा चइत नवरात म ही बोय जाथे। कईझन ह छोकरा-छोकरी के बिहाव संग म करथे, काबर कि नवा बहू आही त माई कलस जोत ह वोकर मुड़ी म रखाय। अइसन करके के पाछू म परिवार के मंगल कामना के बिचार रहिथे।
Published on:
21 Mar 2018 07:45 pm
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