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कोर्ट की तो सुनो अफसरों

Rajesh Lahoti column: स्वत: संज्ञान याचिका में हाईकोर्ट लगातार निर्देश दे रहा है, लेकिन अफसर, विभाग या यूं कहें कि कोई भी जिम्मेदार सुनने या मानने को तैयार ही नहीं है।

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कोर्ट की तो सुनो अफसरों

कोर्ट की तो सुनो अफसरों

राजेश लाहोटी @ समस्याओं को हल करना शासन-प्रशासन का काम है। इसके लिए बाकायदा एक सिस्टम बनाया जाता है। यह सरकार का एक ऐसा आधारस्तंभ होता है, जिस पर सब कुछ टिका होता है, लेकिन जब यही बेलगाम हो जाए और मनमानी पर उतर आए तो फिर किस पर भरोसा किया जाए। छत्तीसगढ़ गठन के बाद जनता के साथ सरकारी सिस्टम का व्यवहार कुछ इसी तरह रहा है। जागरूक लोगों ने कोर्ट का रास्ता देखा। कोर्ट बीच में भी आया, लेकिन सिस्टम में शामिल मठाधीशों को कोई फर्क नहीं पड़ा। हाईकोर्ट के कई आदेश-निर्देशों को तो उन्होंने हवा में उड़ा दिया और जता दिया कि काम तो हमारे हिसाब से ही होगा। जनहित याचिकाओं से जुड़ी एक लंबी फेहरिस्त है जिस पर हाईकोर्ट ने कई आदेश और निर्देश दिए हैं। कटघरे में खड़ा करके अफसरों को बुरी तरह फटकारा तक है, लेकिन मोटी चमड़ी वाले इन अफसरों के लिए डांट खाना आम बात हो गई है। काम तो होते नहीं है, उल्टे अफसरों की गुर्राहट बढ़ती चली जाती है। उदाहरण देखिए...

रायपुर से बिलासपुर मात्र 110 किलोमीटर है। अथाह प्रयासों के बाद नेशनल हाइवे का काम शुरू हुआ। निर्माण में देरी और गड़बड़ी को लेकर 5 साल पहले जनहित याचिका भी दायर की गई। हाईकोर्ट के कड़े निर्देशों के बाद निर्माण कंपनी और शासन ने लगातार शपथ पत्र दिए, लेकिन काम कैसा हुआ? यह इस हाइवे से गुजरने वालों से पूछिए। ना रो पाते हैं और ना ही हंस पाते हैं।

प्रदेश के बहुचर्चित करोड़ों के डामर घोटाले पर तो हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कार्रवाई के लिए आदेश भी दिए, लेकिन सिस्टम ने अनसुना कर दिया। पूर्व वित्त आयोग के अध्यक्ष वीरेंद्र पांडेय को दोबारा याचिका दायर करना पड़ गई। उस समय शासन ने कहा 3 अधिकारी दोषी हैं। इनके खिलाफ एफआईआर होगी। सिस्टम का खेल देखिए कार्रवाई आज भी लंबित है। हाईकोर्ट को बोलना पड़ गया कि ऐसी क्या जांच है जो इतनी लंबी चल गई है?

सरकारी सिस्टम की करतूतों में बिलासपुर का गौरव पथ भी शामिल है। इसमें हुए भ्रष्टाचार का मामला हाईकोर्ट गया। जांच कमेटी ने पहले निर्माण में लगे सभी इंजीनियरों को दोषी पाया। हाईकोर्ट ने जांच करके एफआईआर के आदेश दिए। अब सिस्टम में बैठे महान लोगों का खेल देखिए, उन्होंने आनन फानन में जांच अधिकारी ही बदल दिए, जो कल तक दोषी थे, वे नई जांच कमेटी की नजर में निर्दोष हो गए। सभी महानुभावों को क्लीनचिट मिल गई।

प्रदेश की खराब सड़कों और अधूरे पुलों को लेकर स्वत: संज्ञान याचिका में हाईकोर्ट लगातार निर्देश दे रहा है, लेकिन अफसर, विभाग या यूं कहें कि कोई भी जिम्मेदार सुनने या मानने को तैयार ही नहीं है। ध्वनि प्रदूषण, डीजे के खिलाफ तो 2016 में जनहित याचिका दायर हुई थी, जिसमें कोर्ट के दिशा-निर्देश सभी जानते हैं, लेकिन अफसर आज तक इसे पूरी तरह लागू नहीं करवा पाए हैं। ऐसे एक-दो नहीं, पचासों दिशा-निर्देश हैं, जिनका पालन ही नहीं किया जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों? दरअसल अफसरों का एक बड़ा वर्ग अपने चहेतों को मनपसंद पोस्टिंग देकर बरसों से मनमानी करता आया है। ये ही सिस्टम चलाते आए हैं। अब जरूरत है इन्हें बदलने की। इस व्यवस्था को बदलने की, ताकि जनहित में कम से कम कोर्ट के निर्देशों की तो अवमानना न हो। इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार की बनती है। सत्ताधारी दलों की बनती है जो बेहतर प्रशासन के दावे करने के साथ ही अपने प्रशासनिक ढांचे को जनहित के प्रति जिम्मेदार बनाएं। वहीं हाईकोर्ट के आदेश-निर्देशों का समय सीमा के अंदर पालन हो, इसके लिए भी मॉनिटरिंग होना बेहद जरूरी है। वहीं न्यायपालिका के स्तर पर ही एक व्यवस्था बननी चाहिए, ताकि जनहित में दिए गए उनके हर आदेश-निर्देश का पालन हो सके।