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हाथियों और रेत खनन ने कलिंदर की खेती की बर्बाद

- महानदी कछार में खेती करने वाले किसानों का झटका - छत्तीसगढ़ में महाराष्ट्र और ओडिशा से आ रहा कलिंदर

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हाथियों और रेत खनन ने कलिंदर की खेती की बर्बाद

Elephants and sand mining ruined Kalinder's cultivation

दिनेश यदु @ रायपुर. तपती गर्मी (sweltering heat) से लोगों को राहत देने वाला कलिंदर (तरबूज) (Kalinder (watermelon) की मांग बढऩे लगती है। लेकिन इस साल कलिंदर के लिए छत्तीसगढ़ को महाराष्ट्र और ओडिशा पर निर्भर रहना पड़ रहा है। आरंग, राजिम, शिवरीनारायण से लगे गांवों में महानदी कछार में कलिंदर की बंपर खेती (Kalinder's bumper farming) होती थी। लेकिन आरंग में हाथियों का आतंक (elephant terror) और रेत के बेहिसाब खनन (heavy sand mining) के कारण खेती बर्बाद हो गई है। जनवरी में हुई बारिश ने भी कलिंदर को बर्बाद कर दिया। इससे किसानों को लाखों का नुकसान हुआ है।
दस लाख का हुआ नुकसान
आरंग के निकट पारागांव (Paragaon near Arang) के किसान हेमलाल निषाद ने बताया कि हम लोग हर साल लोग कलिंदर की खेती करते हैं। कोरोना काल में भी हम सब गांव वाले कलिंदर की खेती की थी, पर लॉकडान के कारण हमें दो साल तक फायदा नहीं मिला। इस साल जनवरी में महानदी में हमारे गांव के सभी किसान कलिंदर के पौधे लगाए थे, लेकिन जनवरी में हुए बारिश के कारण डैम से पानी छोड़ दिया गया, जिसके कारण पूरी फसल बर्बाद हो गई। फिर हमने दूसरी बार खेती शुरु की, जिसमे कलिंदर ना लगाकर खरबूज, ककड़ी, खीरा व बरबट्टी लगाए हैं।

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IMAGE CREDIT: Dinesh Yadu @ Patrika Raipur

एक किसान को मिलती है 40 फीट जमीन
पारागांव निवासी किसान तुकाराम कुंभकार ने बताया कि हमारे गांव के करीब 100 किसान दीपावली के बाद नदी में आपस में 40-40 फीट बांटकर खेत तैयार करने में जुट जाते हैं, 10 से 20 दिन में खेत तैयार कर उसमें कलिंदर के बीज डालते हैं, जिससे फसल आने में करीब दो माह लग जाते हैं।
हाथी व रेत उत्खनन भी एक कारण
नोहर चक्रधारी ने बताया कि अब कलिंदर की खेती कर नही पा रहे है, नदी में रेत उत्खनन से घाटों की रेत तेजी से खत्म हो रहा है। जिससे कारण नदी से रेत निकालने वाले हमारे बाड़ी के आसपास रेत उत्खनन करते है और रात में जानबूझकर हमारे खेत के पास से आवाजाही करके खेत नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते है, ताकि हम खेती छोड़ दे। इसके साथ ही हाथी भी हमारे खेत में आ जाते है, जिसके कारण फसल बर्बाद हो जाता है।
यहां नही मिल रहा है कलिंदर
शहर के व्यापारी विष्णु गुप्ता ने बताया कि गर्मी के समय हर साल शहर में कलिंदर की डिमांड बढ़ जाती है। इस साल भी अच्छी मांग है। इस बार आरंग,राजिम, महासमुंद व सिरपुर के आसपास में कलिंदर का फसल कम होने के कारण ओडिसा और महाराष्ट्र से मंगाना पड़ रहा हैं। दो साल पहले कलिंदर का कीमत थोक में 10 से 15 रुपए प्रति किलो मिलता था, इस 15 से 20 रुपए हो गया है।