
रायपुर में किसके पास है प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की कार, जानिए
ताबीर हुसैन @ रायपुर . किसी भी चीज के संग्रहण के पीछे कोई न कोई कहानी छिपी होती है। शहर में बहुत से एेसे लोग है जो अलग-अलग चीजों के कलेक्शन का शौक रखते हैं। बात चाहे सिक्के की हो या नोटों की या फिर डॉक टिकटों की। पुराने-से पुराने रेडियो का भी संग्रहण मिल जाएगा। शहर में महंत घासीदास संग्रहालय और पंडरी स्थित हाट बाजार में भी यूनिक चीजों के बहुत सारे कलेक्शन हैं। आज आपको एेसे लोगों से मिलवा रहे हैं जिनमें पुरानी चीजों को सहेजने का जुनून है।
नागपुर से रायपुर लाई गई जगुआर
देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के पास 1956 मॉडल की मार्क -7 जगुआर कार थी। अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल से उनकी मित्रता थी। 60 के दशक में श्यामाचरण शुक्ला की माइंस की कंपनी चल रही थी। वे उसी वक्त विधायक बने थे। श्यामाचरण ने प्रसाद से कार खरीदी। उस जमाने में यह कार डबल कार्बोरेटर की सिक्स सिलेंडर कार थी। समय बीतता गया और कार नागपुर में रख दी गई जिसे अमितेश शुक्ल रायपुर लेकर आए। लेकिन गाड़ी चलाने में उन्हें लुत्फ नहीं आया और वे इंदौर के सांघी ब्रदर्स जो राजा-महाराजा की गाडि़यों को मेंटेन करते थे। उन्हें बनाने भेजा। अमितेश ने बताया कि काफी समय तक चलाने के बाद उसमें खराबी आ गई है। अभी रिपेयरिंग के लिए दिल्ली भेजा है। बनाने के बाद रायपुर लेकर आएंगे।
पत्थर इकठ्ठा करने का जुनून एेसा कि घर में ही बना दिया म्यूजियम
राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक परसराम साहू को पत्थर कलेक्शन में रुचि है। उन्होंने 200 प्रकार के पत्थर होने का दावा किया है। जिसमें फौसिल के अलावा कई बेशकीमती स्टोन शामिल हैं। संग्रहित पत्थरों का उन्होंने घर में ही म्यूजियम बना दिया है। दूरदराज से लोग देखने आते हैं। उनका निवास कुम्हारी और टिकरापारा में है। उन्होंने बताया, एमपी के छिंदवाड़ा में पेंच नदी के पास जन्म हुआ। बचपन में वे रोजाना वहां नहाने जाया करते थे। इस दौरान रेत से रंगीन पत्थर घर ले आया करते थे। यह सिलसिला 1968 से 1975 तक चला। जब पत्थर घर लाते तो पिता डांटते थे कि ये सब बेकार की चीजें क्यों लेकर आते हो। पत्थर एकत्र करने की आदत जुनून मे तब्दील हो गई। क्रिस्टल और कटेला आदि पत्थर वहां से लाकर यहां संग्रहित करने लगे। छत्तीसगढ़ आने के बाद बस्तर के अलावा अन्य स्थानों से पत्थर कलेक्ट करने लगे। उन्हें ओडिशा, बालोद व भिलाई और दुर्ग में सम्मानित भी किया जा चुका है। अभी तक महाराष्ट्र, ओडिशा और एमपी में एग्जिबिशन लगा चुके हैं। कई स्कूलों में इन्होंने पत्थरों की प्रदर्शनी लगाई है। इन्हें लोग पत्थर वाले गुरुजी के नाम से भी जानते हैं।
120 साल पुराने चांदी के लच्छे
आमतौर पर चांदी से ज्यादा सोने के जेवरात सहेज कर रखे जाते हैं। लेकिन शहर में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो चांदी को संभाल कर रखे हुए हैं। भाठागांव निवासी माधुरी गुहा ने बताया, नानी सास के लगभग 120 साल पुराने चांदी के लच्छे हैं, जो आज के समय में दुर्लभ हैं। खासियत ये है कि इसमें कोई कड़ी नहीं है।
Published on:
18 May 2018 01:30 pm
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