
मां के नक्शे कदम पर चल रही कशिश, सींच रही सांस्कृतिक धरोहर
रायपुर/ताबीर हुसैन. कहते हैं लोक गीतों में भारत बसता है। लोक कलाओं में संस्कृति की सौंधी महक होती है। यही वजह है कि इस कला लोगों की सांसों में समाई होती है। रायपुर की कशिश चन्द्राकर को गायन विरासत से मिला है। उनकी मां छाया चन्द्राकर लोक गायन में एक जाना-पहचाना नाम है। अब कशिश मां के नक्शे कदम पर चल रही हैं। लोक गीतों में उसकी रुचि देख मां छाया गदगद हो जाती हैं।
पहले शिक्षा, फिर अभ्यास
कशिश कहती हैं, पहली गुरु तो मां हैं। उन्होंने उंगली पकड़कर मंच पर खड़े होने का हौसला दिया। मां कहती हैं कि किसी भी विधा में पारंगत होने के लिए विधिवत शिक्षा लेनी चाहिए। इसलिए उन्होंने मेरा दाखिला संगीत महाविद्यालय में कराया। वे चाहती हैं कि मैं उनके नाम से नहीं बल्कि मेरे नाम से वे जानी जाएं। पहले शिक्षा फिर लगातार अभ्यास से खुद को मांजना चाहिए।
'लोक छाया' की परछाई बनूंगी
कशिश के माता-पिता ने लोक कला मंच लोक छाया की शुरुआत 2016 में की थी। राज्य के हर एक कोने में इस मंच ने प्रस्तुति दी है। इस मंच में कशिश नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। मंच से 40 लोक कलाकार जुड़े हैं। कशिश कहती हैं कि इस संस्था को आगे लेकर चलना मेरी जिम्मेदारी है। मैं लोक छाया की परछाई बनकर चलूंगी।
संस्कृति से छेड़छाड़ न हो
कशिश ने चिंता जताई कि छत्तीसगढ़ी के नाम पर कुछ लोग संस्कृति से छेड़छाड़ कर रहे हैं। इससे लोक गीतों की मूल भावना पर असर पड़ रहा है। अगर वे लोक कला को संवार नहीं सकते तो बिगाड़ क्यों रहे।
Published on:
28 Jun 2021 02:34 pm
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