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किसानो का पर्व माना जाता है हरेली, जानिये क्या है गेड़ी और नारियल फेंक जैसे खेल

हरियाली का प्रतीक माना जाने वाला त्यौहार हरेली इस वर्ष जुलाई के 28 तरीक को है। प्रदेश के लोगों द्वारा यह त्यौहार बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है। साथ ही छोटे बच्चे इस त्यौहार में लकड़ियों से गेड़ी बना कर खेलते है। आइये जानते है क्या है इन् खेलों की विशेषता।

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बारिश में सडक़े टूटने का मामला--एलएनटी कार्यालय में किया प्रदर्शन,20 जुलाई को सोमवती अमावस्या में मनाया जाएगा हरेली पर्व

रायपुर। हरियाली के प्रतीक के रूप में मनाए जाने वाले हरेली अमावस्या पर्व कल के दिन यानी जुलाई 28 को मनाया जायेगा, लेकिन इससे पहले ही सावन में शिवालयों में हरियाली छाई रही। सुबह से जलाभिषेक का सिलसिला चलता रहा। शाम को विविध मंदिरों में शिवलिंग का अलग-अलग रूप में श्रृंगार किया गया। छत्तीसगढ़ में अपनी मेहनत से उपजी हरियाली को हरेली के रूप में मनाने का संस्कार वर्षों से चला आरहा है। कृषि युग से हरियाली ने हमारे शरीर और दिमाग को ढक लिया है। यह हमारे किसानेां और पौनी- पसारियों भाईयों, बैसाख की अक्ती, आषाढ़ की रथयात्रा और सावन की हरेली की तरह लगता है, जहां वे भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए मेहनत करते है। हर समय, कड़ी मेहनत के बाद किसान उत्साह की कामना करते है। मंगल का उत्साह समृद्धि लाता है। तन और मन में खुशहाली लाती हैं।

बच्चे भी घुल मिल कर मानते है हरेली
हरेली के दिन विभिन्न खेलकूद का आयोजन किया जाता है, जिसमें नारियल फेंक बड़ों का खेल है इसमें बच्चे भाग नहीं लेते। प्रतियोगिता संयोजक नारियल की व्यवस्था करते हैं, एक नारियल खराब हो जाता है तो तत्काल ही दूसरे नारियल को खेल में सम्मिलित किया जाता है। खेल प्रारंभ होने से पूर्व दूरी निश्चित की जाती है, फिर शर्त रखी जाती है कि नारियल को कितने बार फेंक कर उक्त दूरी को पार किया जाएगा। प्रतिभागी शर्त स्वीकारते हैं, जितनी बात निश्चित किया गया है उतने बार में नारियल दूरी पार कर लेता है तो वह नारियल उसी का हो जाता है। यदि नारियल फेंकने में असफल हो जाता है तो उसे एक नारियल खरीद कर देना पड़ता है। नारियल फेंकना कठिन काम है इसके लिए अभ्यास जरूरी है। पर्व से संबंधित खेल होने के कारण बिना किसी तैयारी के लोग भाग लेते है।

गेड़ी चलाना है सबसे पुरानी परंपरा
हरेली के दिन गावं के बच्चे बॉस को काट कर उससे एक सीडी की तरह दिखने वाला गेड़ी बनाते है। जिसके ऊपर चढ़ने से उनकी लम्बाई और बढ़ जाती है और उससे चलने के लिए काफी संतुलन की आवश्यकता पड़ती है। गावं के बच्चे और युवा गेड़ी में सवार हो कर पुरे गावं में घूमते, नाचते है। इस गेड़ी को बनाने की विधि थोड़ी पेचीदा है। कच्चे बाँस के पेड़ से दो डांग काट कर लायी जाती है। फिर थोड़ा सूखा कर उसके दो हिस्सा कर लिए जाता है। एक हिस्सा बड़ा होता है और एक काफी छोटा। छोटे हिस्से को बीचे से फाड़ दिया जाता है। फाड़े हुए दोनों टुकड़ो को रस्सी की मदद से जोड़ कर लम्बे हिस्से वाले बाँस में बाँध दिया जाता है। रस्सी को इतनी ज़ोर से बाँधा जाता है की उसके ऊपर खड़ा हुआ जा सके। फिर पूरी प्रक्रिया दुसरे बाँस के साथ दोहराई जाती है। बांस की जोड़ी बना कर दोनों में संतुलन बनाते हुए चढ़ते है और फिर संतुलन के साथ चलते है। इस पूरी विधि में आधे से एक घंटे का समय लगता है।