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CG History: आरंग के रीवा में मिले हाथी चिन्ह वाले ‘मघ वंशी’ सिक्के, इतिहास में नए राजवंश शामिल होने के संकेत

Raipur News: प्रदेश की राजधानी से 28 किमी दूर रीवा में पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग द्वारा विगत 3 वर्षों से 60 एकड़ जमीन पर ऐतिहासिक धरोहर की खोज का उत्खनन चल रहा है।

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'Magh Vanshi' coins with elephant symbol found in Rewa of Arang

आरंग के रीवा में मिले हाथी चिन्ह वाले 'मघ वंशी' सिक्के

Chhattisgarh News: रायपुर। प्रदेश की राजधानी से 28 किमी दूर रीवा में पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग द्वारा विगत 3 वर्षों से 60 एकड़ जमीन पर ऐतिहासिक धरोहर की खोज का उत्खनन चल रहा है।

2018-19 में उत्खनन की शुरुआत में ही कुषाण काल, कलचुरी व पांडुवंशीय पुराने धरोहर मिलने लगे थे, लेकिन अब नए राजवंश 'मघ वंशी' होने का संकेत मिलना शुरु हो गया है। उत्खनन स्थल लगभग 6वीं सदी के प्रशासनिक व व्यापारिक स्थल के रूप में विकसित है। इसके साथ मघवंशी तांबे के सैकड़ों सिक्के खुदाई के दौरान मिल रहे हैं।

हाथी के चिन्ह वाले सिक्के

पुरातत्व उप संचालक डॉ. प्रताप चंद पारख ने बताया कि मघवंशी शासन कालीन सिक्कों की खास बात है कि सिक्के हाथी के चिन्ह वाले हैं। 2019-20 में रीवा में उत्खनन के दौरान 12वीं सदी का कल्चुरी काल का सिक्का एक ग्रामीण ने छोटा मटका भरा (CG NEWS) लाकर दिया। खुदाई में वही कुषाण काल सौ सिक्के के साथ कर्मादित्य चित्र बना सिक्का भी प्राप्त हुआ है। लगातार इस क्षेत्र में सिक्के मिलते जा रहे हैं, स्वर्ण, रजत और तांबे के मिलते हैं।

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रिंग वैली व धातु गलाने का पात्र

संयुक्त निदेशक पुरुषोत्तम साहू बताया, इस क्षेत्र में उत्खनन के दौरान दस हजार साल पुराना हाथी का जबड़ा, दो हजार साल पुराना धातु गलाने का पात्र व रिंग वैल मिला। कुषाण काल में इस तरह का कुआं निर्माण पानी पीने, शस्त्र, बेशकीमती समान छिपाने के साथ-साथ सुरंग के रूप में खुद को छिपाने के लिए किया करते थे। अभी कुएं का उपयोग किस कारण से किया गया है, इसपर शोध चल रहा है। अब खुदाई (CG History) में मिले 'मघ वंशी' सिक्कों पर विशेष शोध किया जा रहा है। जो छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक नए राजवंश के शामिल होने का संकेत देता है। 'मघ वंश' का उल्लेख वायु पुराण में मिलता है।

- पहले चरण की खुदाई का कार्य 1 मई से 30 जून तक किया जाना है, इसके बाद दीपावली के बाद फिर से रीवा में खुदाई का कार्य शुरू किया जाएगा।

- डॉ. प्रताप चंद पारख, उप संचालक पुरातत्व

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