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आजादी के लिए जान गंवाने के बदले मंगल पांडेय के परिवार को मिली थी गांव की नफरत

देश के पहले क्रांतिकारी के परिजन का दर्द, बता रहे हैं प्रपौत्र रघुनाथ पांडेय

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रायपुर@पत्रिका। आजादी के 75 बरस पूरे होने की खुशी में पूरा भारत अमृत महोत्सव मना रहा है। इस खास मौके पत्रिका ने बात की देश के पहले क्रांतिकारी मंगल पांडेय के प्रपौत्र रघुनाथ पांडेय से। सन् 1857 में हुए प्रथम स्वाधीनता संग्राम की कहानी, पढ़िए उन्हीं की जुबानी...

उत्तरप्रदेश में बलिया जिले के नगवा गांव में हमारा पुरखौती मकान था। सन् 1831 में यही बाबा (मंगल पांडेय) का जन्म हुआ। परिवार की माली हालत को देखते हुए सन् 1849 में महज 22 वर्ष की उम्र में वे ब्रिटिश हुकूमत की बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में सैनिक के तौर पर भर्ती हुए। देशवासियों पर रोज हो रहे अत्याचार ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। इसी बीच सेना ने एनफील्ड पी-53 राइफल्स में गाय और अन्य जानवर की चर्बी मिले कारतूस का इस्तेमाल शुरू किया। यह हिंदू और मुसलमानों का धर्म भ्रष्ट करने का कुत्सित प्रयास था। बाबा ने इसका खुलकर विरोध किया। अन्य सैनिकों को भी एकजुट किया। इसके बदले 26 साल 2 माह और 8 दिन की उम्र में उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। इस घटना के बाद मेरठ छावनी में भी सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और धीरे-धीरे आंदोलन की आग पूरे देश में भड़क उठी। इधर, हमारे परिवार पर यातनाएं भी बढ़ती गईं। पहले तो अंग्रेजों ने घर को आग के हवाले कर हमें बेघर कर दिया। रही सही कसर गांववालों ने पूरी की। दादा बताया करते थे कि उस वक्त हमारे परिवार से पूरा गांव नफरत करने लगा था। जहां जाते, लोग घृणा की दृष्टि से देखते। गांववाले मानते थे कि हमसे संबंध रखेंगे तो उन्हें भी विद्रोही माना जाएगा। इसी डर से लोगों ने हमसे सालों तक दूरी बनाए रखी। हालांकि, बाबा के बलिदान ने ही लाखों-करोड़ों देशवासियों में अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने का हौसला भी जगाया। आखिरकार शहादत के 90 साल बाद बाबा का सपना पूरा हुआ। हमारा देश आजाद हुआ।

आजादी के 75 बरस पूरे होने पर खास संदेश...

1. जाति-धर्म में न बंटें, यह तो अंग्रेजों की पॉलिसी है

रघुनाथ ने कहा कि देश एक बार फिर जाति-धर्म के नाम पर बंटता नजर आ रहा है। मंगल पांडेय के जीवन से जुड़ी एक घटना बताते हुए उन्होंने कहा, मंगल पांडेय को एक दलित ने ही बताया था कि आप जिन कारतूसों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनमें गाय और ***** की चर्बी मिलाई गई है। यानी सवर्ण से लेकर दलित तक, सबने देश के लिए साथ मिलकर लड़ाई लड़ी थी। तब जाकर हम आजाद हुए। जात-पात के नाम के नाम पर बांटना तो अंग्रेजों की पॉलिसी है। इस चक्कर में न पड़ें। एकजुट रहें।

2. युवा केवल अपना ही नहीं, राष्ट्र व समाज की भी सोचें
मंगल पांडेय, भगत सिंह, खुदीराम बोस जैसे कितने ही क्रांतिकारी हुए जिन्होंने देश की खातिर हंसते-हंसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। आज भारत सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है। सरकारें हमारी युवा शक्ति का इस्तेमाल सही दिशा में करें तो भारत दुनिया का सबसे शक्तिशाली और विकसित राष्ट्र बन सकता है। युवाओं को भी चाहिए कि सिर्फ खुद के बारे में न सोचें। राष्ट्र और समाज के लिए भी कुछ बेहतर करने की भावना रखें।

3. ऐसा देश बनाएं जिसका सपना पूर्वजों ने देखा था
क्रांतिकारियों ने जंग केवल इसलिए नहीं लड़ी कि उन्हें अंग्रेजों से आजादी चाहिए थी। उन्हें अपना देश चाहिए था जहां हर भारतवासी खुशहाल हो। अफसोस कि आजादी के 75 बरस बाद भी हम गरीबी और भुखमरी से जूझ रहे हैं। भ्रष्टाचार, बढ़ते अपराध देश को खोखला कर रहे हैं। आइए ऐसे राष्ट्र बनाने की ओर सभी साथ मिलकर कदम बढ़ाएं जहां हर व्यक्ति के लिए प्रेम, सत्कार और सहयोग की भावना हो। जहां हिंसा और दंगों के लिए कोई स्थान न हो।