
ताबीर हुसैन @ रायपुर .कक्षा दूसरी में फैंसी ड्रेस में हनुमान के गेटअप में हिस्सा लेना था, लेकिन मंच तक जाने तक हिचक हो रही थी। प्रैक्टिस तक सही रूप आ नहीं रहा था लेकिन स्टेज पर पहुंचा तो बहुत अच्छे से कर पाया। यह पहली सीढ़ी थी नाटक की। इसके बाद राज्य स्तरीय नाटक में पार्टसिपेट किया। मेरे काम को सराहा गया। फिर ओडिशा में बाढ़ से किसान के दर्द पर केंद्रीय लीड रोल किया। यह कहना है रंगकर्मी और राजकुमार कॉलेज के शिक्षक रंजन मोदक का। उन्होंने बताया, छग राज्य गठन के समय सत्य साईं समिति की ओर से मुझे सत्य साईं आश्रम में म्यूजिकल नाटक संजीवनी डायरेक्ट करने का मौका मिला, 'जो मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है' थीम पर आधारित था। इसमें प्रदेश के 700 कलाकारों ने अभिनय किया था।
क्या बदलाव आता है
यदि आप बालपन से नाटक से जुड़ जाएं तो आपका व्यक्तित्व विकास अलग ही दिशा में होने लगेगा। पर्सनालिटी डवलपमेंट के लिए रंगकर्म सबसे बेहतर रास्ता है। जब कोई बालक किसी नाटक की प्रस्तुति देने जाता है तो वह सबसे पहले यही सीखता है कि खुद के सामान को सुरक्षित कैसे रखा जाए। इसके अलावा वह यह सीखता है कि खाने के बाद प्लेट को धोकर कैसे किनारे रखना है। उसके बोलने-चलने व उठने से लेकर पूरे व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव नजर आता है।
क्यों जरूरी : मनोरंजन के तमाम साधनों में थियेटर का अलग ही स्थान है। इसमें कोई रिटेक नहीं होता। व्यक्ति नाटक देखकर दुनियादारी समझ सकता है। परखने की कला विकसित होती है। मैं समझता हूं कि समाज में बेहतर संदेश पहुंचाने का सशक्त माध्यम नाटक है।
एेसे आए निर्देशन में
हायर सेकंडरी स्कूल के बाद दुर्गा कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसपल जोगलेकर सर ने मुझे नाटकों में काम करने के लिए प्रेरित किया। अनिल कालेले निर्देर्शित मराठी के आठ नाटकों में अभिनय किया है। ढाई घंटे वाले बड़े नाटक आठ से 10 किए हैं। हिंदी के बड़े नाटकों की बात करूं तो करीब 15 किए हैं। हमारे वरिष्ठ अनिल कालेले, राजकमल नायक, कुंजबिहारी शर्मा के मार्गदर्शन में मैंने नाटक की बारीकियां सीखी। मुझे लगा कि निर्देशन करना चाहिए। मैंने अब तक सात नाटक निर्देशित किए हैं जो छोटे बच्चों के साथ हैं। जमशेदपुर, टाटानगर, नागपुर, पुणे, भिलाई, कोलकाता, भोपाल और इंदौर की नामचीन नाट्य संस्थाओं में वरिष्ठों के निर्देशन में अभिनय किया है।
Published on:
06 May 2018 03:13 pm
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