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नहीं मिल रही RTI के तहत जानकारी, आमरण-अनशन पर बैठे

नहीं मिल रही आरटीआई के तहत जानकारी, आमरण-अनशन पर बैठे

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CG News

नहीं मिल रही RTI के तहत जानकारी, आमरण-अनशन पर बैठे

बागबाहरा. हाईकोर्ट के निर्देश के बावजूद प्रशासन द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत् आरटीआई कार्यकर्ता मूलचन्द चन्द्राकर द्वारा मांगी गई जानकारी प्रशासन द्वारा नहीं देने से व्यथित होकर वे अपने साथियों के साथ आमरण-अनशन पर बैठ गए हैं।

जबकि, प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सूचना का अधिकार अधिनियम किसी भी लोक प्राधिकारी से सूचना लेने के लिए नागरिकों को सशक्त बनाता है। ग्राम पंचायत सुवरमाल में किए गए निर्माण कार्यों में सरपंच द्वारा कथित रूप से किए गए भ्रष्टाचार की वर्ष 2016 को मांगी गई समस्त जानकारी उपलब्ध नहीं किए जाने पर और प्रथम व द्वितीय अपीलीय प्राधिकारी द्वारा जानकारी प्रदत्त नहीं करने पर राज्य सूचना आयोग के समक्ष अपील करने पर नाकाम होने के बाद हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी। हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी जानकारी नहीं मिलने से नाराज याचिकाकर्ता ने आमरण अनशन का निर्णय लिया।

मूलचन्द चन्द्राकर और उपसरपंच प्रतिनिधि व पंचों के साथ 27 सितम्बर से आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। हाईकोर्ट ने यह भी साफ कर दिया था कि नियमों के मुताबिक समय सीमा के भीतर सूचना पाने का अधिकार जिसका प्रकट होना लोकहित गतिविधियों से सम्बन्धित हो, याचिकाकर्ता को देना होगा, बावजूद हैरानी की बात है कि लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को बोलने की आजादी तब तक मायने नहीं रखती, जब तक कि उसे जानने का मूल अधिकार की आजादी न हो। आमरण अनशन पर बैठे याचिकाकर्ता का राज्य प्रशासन से यही सवाल है कि वह जनता के प्रति जवाबदेही और पारदर्शिता से बचने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? सूचना का अधिकार अधिनियम इस तथ्य पर आधारित है कि जनता टैक्स देती है। इसलिए उसे जानने का हक है कि उसका पैसा कहां खर्च हो रहा है और उसका सरकारी तंत्र कैसे चल रहा है इसलिए जनता को सरकार के हर पक्ष से सब कुछ जानने का अधिकार है, चाहे मुद्दा उससे प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ा हो या न जुड़ा हो, इसलिए वह जानकारी मांग सकता है।

सूचना प्राधिकारी जानबूझ कर हाईकोर्ट के निर्णय को न माने तो यह अदालत की प्रतिष्ठा के खिलाफ की गई अवज्ञा है। दुर्भाग्यवश नौकरशाही में अभी भी गोपनीयता का बोलबाला है और लोक सूचना अधिकारी इसलिए आवेदनों को रद्द कर देते हैं और सूचनाधिकार कानून के तहत् सूचना मांगने वाले आवेदक को राज्य में परेशान किया जाता है और जानकारी नहीं दी जाती है और संघर्ष करना पड़ता है।

आमरण अनशन पर बैठे आरटीआई. कार्यकर्ता द्वारा 22 अप्रैल 2016 को आवेदन किए दो साल से अधिक समय बीत गया, इसके बाद यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या आरटीआई.सार्थक है। आमरण अनशन पर बैठे आरटीआई कार्यकर्ता पर प्राप्त जानकारी के अनुसार पूर्व में जानलेवा हमला किया जा चुका है। धमकी दी जाती है। उस स्थिति में सूचना मांगने वाले आवेदक को जान का खतरा मंडराता रहता है। इस कारण मजबूर होकर हड़ताल करनी पड़ रही है।