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पद्मविभूषण के लिए चयनित हुई डॉ. तीजन बाई, बोली- मेरी हर सांस में पंडवानी, मैं बाचूंगी, मैं बाटूंगी

किसी को अंदाजा नहीं होगा कि अंगूठा छाप तीजन बाई का सफर पद्मश्री से शुरू होकर पद्मविभूषण तक पहुंचेगा।

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teejan bai

पद्मविभूषण के लिए चयनित हुई डॉ. तीजन बाई, बोली- मेरी हर सांस में पंडवानी, मैं बाचूंगी, मैं बाटूंगी

रायपुर/भिलाई. डॉ. तीजन बाई ने जब बीएसपी में नौकरी पाने रोजगार कार्यालय में अपना नाम दर्ज कराया तो अधिकारी ने उनका मजाक उड़ाया था कि अंगूठा छाप हो बीएसपी में क्या करोगी..? पर शायद उस वक्त किसी को अंदाजा नहीं होगा कि अंगूठा छाप तीजन बाई का सफर पद्मश्री से शुरू होकर पद्मविभूषण तक पहुंचेगा। डॉ. की मानद उपाधि से लेकर देश-विदेश के कई सम्मान उनके नाम हो चुके हैं। उनका कहना है कि जब तक रहूंगी मेरी हर सांस में पंडवानी रहेगी। मैं बाचूंगी। मैं बाटूंगी।

शुक्रवार की रात जब दिल्ली से फोन आया कि इस वर्ष उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान पद्मविभूषण से नवाजा जा रहा है, तो पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। 62 वर्ष की उम्र में आज भी जब तीजन बाई मंच पर उतरती हैं, तो उनका वही पुराना अंदाज होता है। तेज आवाज के साथ पात्रों के साथ-साथ बदलते चेहरे के भाव पंडवानी में चार चांद लगा देते हैं। 1980 में विदेश यात्रा के बाद उन्होंने कभी पीछे मुडक़र नहीं देखा। 1988 में पद्मश्री और 2003 में कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से अलंकृत की गईं। उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा 2007 में नृत्य शिरोमणि से भी सम्मानित किया जा चुका है। वही सितंबर 2018 में जापान ने उन्हें फोकोओका सम्मान से सम्मानित किया।

तीजनबाई ने पहली प्रस्तुति 13 साल की उम्र में दुर्ग जिले के चंदखुरी गांव में दी थी। बचपन में नाना ब्रजलाल को महाभारत की कहानियां गाते सुन वह भी साथ-साथ गुनगुनाती थीं। कम समय में ही उन्हें कहानियां याद होने लगीं तब उनकी लगन और प्रतिभा को देखकर उमेद सिंह देशमुख ने तीजनबाई को अनौपचारिक प्रशिक्षण भी दिया। बाद में उनका परिचय प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर से हुआ। तनवीर ने उन्हें सुना और तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के सामने प्रदर्शन करने का मौका दिया। उस दिन के बाद से उन्होंने देश-विदेश में कला का प्रदर्शन किया।

पंडवानी को दो शैली में गाया जाता है वेदमती और कापालिक। महिलाएं वेदमती शैली में पंडवानी केवल बैठकर गाती थीं। वहीं कापालिक शैली में पुरुष खड़े होकर पंडवानी गाते थे, लेकिन तीजनबाई पहली महिला है जिन्होंने कापालिक शैली को अपनाया। आज भी छत्तीसगढ़ी लुगरा (साड़ी)के साथ पारंपरिक गहने पहनकर जब डॉ. तीजन मंच पर उतरती हैं तो दर्शक महाभारत के पात्रों को उनके अंदाज में जीवंत पाते हैं। अपने तंबूरे के साथ वे कई चरित्र और पात्रों को भी दिखाती हैं। उनका तंबुरा कभी गदाधारी भीम की गदा तो कभी अर्जुन का धनुष बन जाता है। अपने तंबूरे के साथ वे कई चरित्र और पात्रों को एकल अभिनय के जरिए दिखाती हैं।

‘पत्रिका’ से चर्चा करते हुए डॉ. तीजन ने कहा कि वैसे तो पहले भी दो पद्म पुरस्कार मिल चुके हैं मगर सर्वोच्च सम्मान मिलना खुशी की बात तो होती ही है। मुझ तीजन की क्या बिसात, वो तो कला है, पंडवानी जैसी कला जो सम्मान पा रही है। मेरी दिली ख्वाहिश है कि मेरे बाद भी पंडवानी ऐसे ही ऊंचे मुकाम को छूती रहे। छत्तीसगढ़ की इस संस्कृति व कला को संरक्षित रखने मैं नई पीढ़ी को पंडवानी सिखा रही हूं। अब तक 217 बेटियों को प्रशिक्षण दे चुकी हूं।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पंडवानी गायिका तीजन बाई को पद्म विभूषण और कलाकार अनूप रंजन पांडेय को पद्मश्री के लिए चयनित किए जाने पर बधाई दी है। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की समृद्ध कला एवं संस्कृति को और अधिक समृद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाई है। इसी तरह अनूप रंजन पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कलाकार हबीब तनवीर दिखाए गए मार्ग पर चलते हुए अनूप रंजन पाण्डेय ने रंगमंच तथा विविध कला क्षेत्रों के माध्यम से अनेक प्रयोग एवं कार्य किया। उन्होंने बस्तर की विविध पारम्परिक नृत्यों को जोडक़र उन्होंने ‘बस्तर बैंड’ के माध्यम से जो कार्य किया, उसने यहां की लोक कला संस्कृति को विशिष्ट पहचान दी।