
रायपुर. मखाने की खेती ऐसी है जिसमें न तो खाद और न ही कीटनाशक का इस्तेमाल होता है। खर्च के नाम पर काफी कम पैसे लगते हैं और जब बेचने की बारी आए तो लाखों में कमाई होती है। इसकी मांग इसलिए बढ़ी है क्योंकि यह रासायनिक प्रभावों से मुक्त ऐसा फल है जो पौष्टिकता में अच्छे-अच्छे फलों को मात देता है।
मखाने का बोटैनिकल नाम यूरेल फेरोक्स सलीब है, जो साधारण बोल-चाल कि भाषा में ,कमल का बीज कहलाता है | इसे गर्म और शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है | मखाने में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा पायी जाती है, जो मानव शरीर के लिए अत्यधिक लाभकारी है| पूरे भारत में तक़रीबन 15 हजार हेक्टेयर के खेत में मखाने की खेती की जाती है | अकेले बिहार राज्य में ही तकरीबन 80 से 90 फीसदी मखाने का उत्पादन किया जाता है।
मखाने की खेती के लिए जलभराव वाली भूमि की आवश्यकता होती है | इसके पौधों पर कांटेदार पत्ते पाए जाते है व इन्ही पत्तो पर बीजो का विकास होता है | मखाने की खेती के लिए चिकनी दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है तथा जलाशयों, तालाबों व नीचली जमीन में रूके हुए पानी में इसकी अच्छी उपज होती है। निचली भूमि जिसमें धान की खेती होती है,वहां मखाने का अच्छा उत्पादन होता है। मखाने की खेती की अधिक पैदावार के लिए अच्छे और उन्नत बीजों का होना भी बहुत जरूरी है। इसके लिए आप प्रमाणित बीज का ही उपयोग करें।
मखाने की खेती की अब कई विधियां उन्नत हो चुकी हैं। जिसमें तालाब विधि, रोपाई विधि एवं नर्सरी विधि शामिल हैं। लेकिन इनमें सबसे उपयुक्त, आसान और किफायती तालाब विधि है। मखाने की खेती के लिए ऑर्गेनिक तरीके का इस्तेमाल किया जाता है | इसकी खेती के लिए तालाब को तैयार किया जाता है ।
कैसे होता है बाजार में मिलने वाला मखाना तैयार
आप जिस मखाने को बजार में देखते है उसे उस रूप तक पहुंचाने में किसानों की काफी मेहनत लगती है। पहले मखाने का बीज तैयार किया जाता है। जिसे स्थानीय भाषा में गुणी भी कहते है। ये बिल्कुल कमलगट्टा ही है। बीज तैयार करने के बाद उसमें से मखाने को निकालना फाइनल प्रॉसेसिंग है। वहीं अगर कोई अपने यहां मखाने के बीज पैदा करता है। तो वह लागत की तुलना में डबल कमाई कर लेता है। किसान अक्सर मखाने की फसल मार्च और अप्रैल में लगाते है और अगस्त- सितंबर में पैदावार देती है। यदि किसान चाहे तो सितंबर से मार्च तक किसान एक और पैदावार लगा सकता है । हालांकि इस वक्त पैदावार कम होती है ।
मखाने की खेती में आरम्भिक अवस्था में अवांछित पौधे हो जाते हैं। इसके लिए आप सिंघाड़े और मछली पालन करके अवांछनीय पौधों को नष्ट कर सकते हैं। इससे आपको दोहरा लाभ होगा। मखाना की खेती में बहुत ही कम लागत आती है। यदि आप खुद इसके बीजों की प्रोसेसिंग करते हैं, तो लागत अधिक आएगी लेकिन मुनाफा भी अधिक होगा।
एक एकड़ की मखाना की खेती करके आप 3-4 लाख रुपये की कमाई कर सकते हैं। बड़ी बात यह है कि मखाना निकालने के बाद स्थानीय बाजारों में इसके कंद और डंठल की भी भारी मांग होती है जिसे किसान बेचकर पैसा कमा सकते हैं।
गौरतलब है कि मखाना के पौधे का इस्तेमाल दवा के रूप में भी होता है। इस वजह से इसकी मांग अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी खूब है। कच्चे फल की मांग को देखते हुए ,किसानों को कहीं भटकना भी नहीं पड़ता, बल्कि बाजार में आसानी से बिक जाता है।
मखाना खाने से मिलते है कई फायदे
मखाने का प्रयोग हम अक्सर ड्राई फ्रूटस के लड्डू हो या व्रत का फलाहार या फिर नमकीन में करते ही है।इससे इन सब चीजों का स्वाद तो बढ़ ही जाता है, साथ ही उनमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैलोरी जैसी कई चीजे बढ़ जाती है।मखानों में कैल्शियम मैग्नीशियम प्रोटीन भी पाया जाता है।साथ ही साथ मखाने ग्लूटेन फ्री भी होते हैं। इसलिए जिनको ग्लूटेन से एलर्जी होती है। वह भी मखानों का सेवन आराम से कर सकते हैं।मखाने में कोलेस्ट्रॉल और सोडियम की मात्रा काफी कम होती है ,इसलिए यह सेहत को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
Published on:
29 Jun 2022 06:00 pm
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