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EXCLUSIVE INTERVIEW:  राइट टू रिकॉल भारत में संभव नहीं- मनीष तिवारी

कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने पत्रिका से खास बातचीत करते हुए कहा हमारे देश की पापुलेशन और विधानसभा क्षेत्र, लोकसभा क्षेत्र का दायरा इतना बड़ा है कि राइट तो रिकॉल लागू करना संभव नहीं है। 

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Abhishek Jain

Sep 25, 2016

Patrika exclusive interview with Manish Tiwari

Patrika exclusive interview with Manish Tiwari

जयंत कुमार सिंह/ रायपुर. कांग्रेस प्रवक्ता, अधिवक्ता मनीष तिवारी का कहना है कि वर्तमान परिदृश्य में जो लोगों की ओर से मांग की जा रही है कि हमारे देश में भी प्रजातंत्र के उन नियमों और अधिकारों का पालन किया जाना चाहिए जो स्वीटजरलैंड की डेमोक्रेसी में देखने को मिलती है। यह संभव हो सकता है यदि देश के गांव-गांव में इंटरनेट पहुंच जाए, कंप्यूटर पहुंच जाए, हर घर में कनेक्शन हो और लोग इसका इस्तेमाल करने लगे। इसके बाद देश में पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी को लागू करना संभव होगा। तिवारी उस सवाल का जवाब दे रहे थे जिसमें उनसे यह पूछा गया था कि हमारे देश में भी स्वीटजरलैंड के डेमोक्रेसी को लागू करने की कितनी संभावनाएं हैं। तिवारी पत्रिका के की-नोट कार्यक्रम में शिरकत करने रायपुर पहुंचे थे।

रिकॉल के अधिकार पर...
तिवारी से जब स्वीटजरलैंड की डेमोक्रेसी के रिकॉल कांसेप्ट पर सवाल किया गया तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना था कि हमारे देश की पापुलेशन और विधानसभा क्षेत्र, लोकसभा क्षेत्र का दायरा इतना बड़ा है कि इसे लागू करना संभव नहीं है। यदि लागू किया गया तो ऐसा होगा कि जो हार गया वह पूरे साल रिकॉल के प्रयास में लग जाएगा और काफी कार्य प्रभावित होगा।

वर्तमान राजनीति की चाल और उद्देश्य में परिवर्तन
वर्तमान राजनीति की चाल और राजनीति के वास्तविक उद्देश्य में आए परिवर्तन के सवाल पर तिवारी ने कहा कि देखिए भारतीय राजनीति में सुधार की हमेशा क्षमता रहती है। तीन बिंदुओं पर ध्यान देना होगा। जिसमें पहला चुनाव घोषणा पत्र को जवाबदेह बनाने का कार्य करना होगा। दूसरा चुनाव फायनेंसिंग की प्रक्रिया पर ध्यान देना होगा। वहीं तीसरा अहम विषय यह है कि राजनैतिक पार्टियों के अंदर लोकतंत्र हो तो राजनीति के उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है।

दब रहे हैं ग्रामीण मुद्दे, लोग बने हैं वोट बैंक....
जब तिवारी से पूछा गया कि आखिर क्या वजह है कि वर्तमान में गांवों के मुद्दे संसद में नहीं उठते हैं, ग्रामीणों का इस्तेमाल केवल वोट बैंक के रूप में किया जाता है, किसी खास बात पर ही फोकस किया जाता है। इस पर तिवारी का कहना था कि यह सच नहीं है। आप प्रोफाइल उठाकर देखिए अधिकांश सांसद ग्रामीण क्षेत्र से चुनकर आते हैं। वो गांवों में अपना समय भी गुजारते हैं।

उम्मीदवार थोपे जाते हैं
तिवारी का कहना था कि जो सांसद लोगों के मुद्दे संसद में नहीं उठाते हैं उन्हें खारिज किया जाना चाहिए। जब तिवारी से यह पूछा गया कि ऐसा हमेशा आरोप लगता है कि राजनैतिक दल वोटरों पर उम्मीदवार थोपते हैं। इस पर उनका कहना था कि नोटा का आप्शन दिया गया है, लोग ऐसे उम्मीदवारों को रिजेक्ट कर सकते हैं जो उनकी बात नहीं उठाते हैं या फिर काम नहीं करते हैं।

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