
महंगई बाढि़स त कतकोन के सोच घलो बाढि़स!
‘बुझो-बुझो गोरखनाथ अमरित बानी, बरसे कमरा भींजे ल पानी जी। कौआ के डेरा मा पीपर के बासा, मुसवा के बिला म बिलई होय नासाजी।’ ए छत्तीसगढ़ी गीत के उलटबासी कस आज देस-दुनिया म कतकोन बात देखे-सुने बर मिलथे। समाज म कतकोन अइसे मनखे मिल जहीं, जउन सत ल असत अउ असत ल सत बताय म कोनो कोर-कसर नइ छोड़ंय। वोकर गियान बघरई ल देख-सुन के दूसर के मुड़ी चकराय ल धर लेथे।
एकझन सियान ह रेडियो म ‘महंगाई डायन खाय जात हे’ अउ ‘महंगाई मार गई’ जइसे गीत सुनके सरकार ल अब्बड़ कोसत रहय। हमर जमाना म ए जिनिस अतका पइसा म मिलय, तेन ह मनमाने बाढ़ गे हे कहिके बड़बड़ावत रहय। नाती-नतुरामन वोकर बात ल सुनके हांसत रहंय। बबा ल का हो गे हे कहिके गोठियावत रहंय।
कुछ दिन पहिली एकझन संगवारी ह पेटरोल के दाम मनमाड़े बाढ़ हे कहिके चिंता-फिकर करत बइठे रिहिस। उही बेरा म वोकर बेटा ह मोटर साइकिल बिसाय बर पइसा मांगत रोमिहाय रहय। वोहा कहिस, बेटा अभी तो थोकिन धीरज धर। देखत नइयत, पेटरोल के दाम बादर कोती टंगावत हे। लइका ह झट ले मुंह बिचकावत बोलिस, ददा, तोर सोच ह जुन्ना होगे हे। पेटरोल महंगा नइ होय हे। अतका सुनके ददा हक्का-बक्का रहिगे। अरे बेटा, देसभर म पेटरोल के महंगई ल लेके हाहाकार मचे हे अउ तेहा कहिथस पेटरोल के भावेच नइ बाढ़े हे। तोला कुछु खबर हावय के नइ, ऐकर बाद म महंगई कतेक ऊपर टंगाइस तेकर?
बेटा ह हांसिस। ददा, महंगई-वहंगई कुछु नइ होवय। ए सब मन के भरम हे। ददा ल लगिस, टूरा ह आईपीएल या राजनीति के चक्कर म तो नइ पर गे हे। तभे ऐला दार-रोटी के भाव के पता नइए। ददा कहिस, जब घर-गिरिहस्थी के चक्कर म परबे तब पता चलही।
बेटा कहिस- ददा, पेटरोल के दाम रोज बाढ़त हे, त का मोटरगाड़ी के बिसई कम होइस हे? या एसी, मोबाइल, फ्रिज के रोज नवा दुकान खुले के बाद घलो बाजार म भीड़ रुके हे? ददा, देस तरक्की करत हे। लोगनमन के सामान बिसई के पावर बढ़त हे। रेंगइयामन मोटरसाइकिल म आ गे हे। साइकिल वाले ह कार लेवत हे। सापिंग मॉल म गोड़ रखे के जगा नइए। देस ह 5 जी कोती जावत हे अउ तेहा बइलागाड़ी के चिंतन करत हस। ददा, बिकास के कीमत होथे, वोला महंगई नइ काहय।
बेटा ह अपन गियान बघारत कहिस- ददा महंगई से निपटे बर हे त चिंता झन करव। बडक़ा लोगनमन के जिनगी ल देख, वोमन कइसे महंगई से निपटथें। तेहा धरना-परदरसन के बात करथस। जउनमन ऐकर आयोजन करथे, वोकरमन से पूछव के आज भीड़ सकेले के कतेक खरचा बाढ़ गे हे। फेर, कोनो रैली करवइया के माथा म चिंता के लकीर देखे हस? ददा, तेहा अपन सोचे- बिचारे के ढंग ल बदल। आमदनी बढ़ाय के सोच। काबर के पेटरोल, डीजल, गैस अउ रुपिया के मार तो अइसने चलत रइही।
आज घर-परिवार, समाज-देस म लोगनमन ल जेन समझाथें, उहीमन ल उलटा अपन गियान देवइया, समझइया एक खोजबे त कोरी-कोरी मिल जथे। समझदार ल नासमझ समझे के समे म अउ का कहिबे।
Published on:
09 Oct 2023 03:57 pm
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