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होली राग, रंग और गुलाल का ऐसा उत्सव है जो मनुष्य को बाहर से ही नहीं, भीतर से भी रंग देता है.. भाषाविद् चितरंजन से विशेष बातचीत

Holi 2026: भाषाविद चितरंजन कर बताते हैं कि फाल्गुन और वसंत के आगमन के साथ प्रकृति, लोकवाद्य, रंग और सामाजिक समरसता मिलकर एक ऐसा उत्सव रचते हैं, जिसमें भेद मिट जाते हैं...

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होली राग, रंग और गुलाल का ऐसा उत्सव है जो मनुष्य को बाहर से ही नहीं, भीतर से भी रंग देता है.. भाषाविद् चितरंजन से विशेष बातचीत

ताबीर हुसैन. होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन में राग, ऋतु और प्रेम का अद्भुत संगम है। भाषाविद चितरंजन कर बताते हैं कि फाल्गुन और वसंत के आगमन के साथ प्रकृति, लोकवाद्य, रंग और सामाजिक समरसता मिलकर एक ऐसा उत्सव रचते हैं, जिसमें भेद मिट जाते हैं और मनुष्य भीतर तक रंग जाता है। नगाड़े और डफली की थाप वास्तव में वसंत के आगमन की घोषणा है। जब फाल्गुन आता है तो प्रकृति, वन-उपवन, पलाश के फूल और सुहावना मौसम पूरे वातावरण को आनंद और रस से भर देते हैं। होली हमारी प्राचीन परंपरा से जुड़ा वर्षांत उत्सव भी है। हिंदू पंचांग में वर्ष चैत से फाल्गुन तक माना जाता है, इसलिए फाल्गुन से ही फाग शब्द बना और उसी से फाग उत्सव की परंपरा विकसित हुई।

सामाजिक समरसता का उत्सव

गुलाल को पहले फल्गु कहा जाता था, जो प्रकृति के रंगों का प्रतीक है। पुराने समय में रंग औषधीय जड़ी-बूटियों से बनते थे, जो त्वचा को नुकसान नहीं पहुंचाते थे। नगाड़ा, डफली जैसे लोकवाद्य होली के अभिन्न अंग हैं। ये कृत्रिमता से दूर, गांवों में सहज उपलब्ध वाद्य हैं, जिन्हें विशेष समुदाय बनाते और हर उत्सव में उपयोग करते हैं। रंग और राग दोनों शब्द एक ही धातु रंज से बने हैं। रंग जाना, प्रेम में रंग जाना। होली का सार भी यही है कि मनुष्य प्रेम के रंग में रंगे। होली सामाजिक समरसता का उत्सव है। एक प्रकार का भारतीय कार्निवाल, जिसमें ऊंच-नीच, धन-निर्धन, जाति-पांति या स्त्री-पुरुष का भेद नहीं रहता। सब एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और समान हो जाते हैं।

क्षेत्रीय विविधताओं में रूप अलग लेकिन मूल भाव प्रेम

लोक परंपरा में होली पर गाली गीत भी गाए जाते थे, जिन्हें अपमान नहीं माना जाता था, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से होलिका पर कहा जाता था। उस असत्य पर जो प्रह्लाद को जलाना चाहती थी। प्रेम के दो रूप बताए गए हैं। इश्क मिजाजी (लोकिक प्रेम) और इश्क हकीकी (अलौकिक प्रेम)। लोकिक प्रेम ही धीरे-धीरे श्रद्धा और भक्ति में उदात्त होकर विकसित होता है। भारत की क्षेत्रीय विविधताओं में होली के अलग-अलग रूप हैं। बरसाने में राधा-कृष्ण, अवध में राम-सीता, कहीं शिव-पार्वती। पर मूल भाव एक ही है, प्रेम।

प्रेम ही सृष्टि का सामगान

भारतीय जीवन में ईष्ट देव दैनिक जीवन से अलग नहीं हैं। जन्म, विवाह, पर्व, गीत हर जगह राम, कृष्ण, शिव, पार्वती, राधा, सीता की उपस्थिति हमारे सांस्कृतिक आधार को दर्शाती है। अंतत: होली राग, रंग और गुलाल का ऐसा उत्सव है जो मनुष्य को बाहर से ही नहीं, भीतर से भी रंग देता है। यह प्रेम का वह विस्तार है जिसमें ऊंच-नीच और मेरा-तेरा समाप्त हो जाता है। प्रेम ही सृष्टि का सामगान है। जब तक यह बना है समाज में सौहार्द और शांति संभव है और होली उसी प्रेम को जगाने वाला लोकपर्व है।