
ताबीर हुसैन@ रायपुर . सिंगिंग के क्षेत्र में आने का इरादा नहीं था, पापा गोवर्धन दास उदासी और चाचा दिलीप उदासी को बचपन से गाते सुनता था। मुझे लगता था कि पैरेंट्स सिंङ्क्षगग के लिए मुझ पर प्रेशर डाल रहे हैं। लेकिन समय रहते मैं संगीत को समझ गया, थैंक्स गॉड कि मैंने इस क्षेत्र को छोड़ा नहीं और आज भी मेरा सफर जारी है। यह कहना है सिंधी गीतों के सिंगर जतिन उदासी का। हाल ही में वे एक लाइव कंसर्ट में रायपुर पहुंचे थे। प्रस्तुत है बातचीत के अंश।
गायकी के प्रति कब से है रुझान?
चूंकि मेरे घर में ही संगीत का माहौल था। चार साल की उम्र से गाने लगा था, लेकिन इसमें कॅरियर बनाने का कोई इरादा नहीं था। हर इंसान की सामाजिक जिम्मेदारी भी होती है कि वह खुद के अलावा अपनी सोसायटी के लिए भी कुछ करें। परिवार को लोगों को सिंधी भाषा को प्रमोट करते देख मैं भी प्रभावित हुआ और उस्ताद हिफजुल कबीर साहब से तालीम ली। इसके बाद लाइव परफार्म करने लगा।
कहां-कहां परफार्म कर चुके हैं?
इंडिया के लगभग सभी बड़े शहरों में प्रोग्राम दे चुका हूं। इसके अलावा यूके, थाइलैंड, चाइना, हांगकांग और दुबई में कार्यक्रम दिए हैं। आजा रे... एल्बम मेरा लोकोप्रिय है। इसे फेसबुक और यूट्यूब पर 50 मीलियन लोग देख चुके हैं। साथ ही १०-१२ एल्बम हैं। कुछ और भी प्रोजेक्ट हैं जिस पर काम चल रहा है। इन फ्यूचर बालीवुड में भी कदम रखने का इरादा है।
रियाज के लिए कितना वक्त देते हैं?
यह विधा है ही एेसी कि बराबर रियाज की जरूरत पड़ती है। कभी एेसा होता है जब टफ शेड्युल हो या गला खराब हो तो मैं अभ्यास नहीं कर पाता अदरवाइस 2 से 3 घंटे तो प्रैक्टिस के लिए मुकर्रर हैं।
नए गायकों को क्या मैसेजे देंगे?
अपनी लाइफ के अलावा समाज और देश के लिए भी जिम्मेदारी होती है उस पर जरूर सोचना चाहिए। इसके अलावा जो काम आपको करना है उस पर फोकस करो। उसके पीछे पड़ जाओ, जब तक उसे अचीव नहीं कर लेते छोड़ो मत। सफलता आपको मिल कर रहेगी।
Published on:
18 Mar 2018 01:18 pm
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