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यहां 1 रुपए में झोला भर मिल रहा टमाटर, खरीदने उमड़ रही लोगों की भीड़

किसान अब टमाटर को या तो सडऩे के लिए खेतों में छोड़ रहे हैं अथवा सड़कों पर फेकने मजबूर हैं..

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CG news

दुर्ग . पिछले साल अगस्त-सितंबर में 90 से 100 रुपए किलो बिकने वाले टमाटर का अब मंडियों में खरीदार नहीं मिल रहे हैं। हालात यह है किसान अब टमाटर को या तो सडऩे के लिए खेतों में छोड़ रहे हैं अथवा सड़कों पर फेकने मजबूर हैं। गुरुवार को इसी तरह धमधा ब्लॉक के परसुली गांव के आधा दर्जन से ज्यादा किसानों ने 20 से 30 क्विंटल टमाटर सड़क के किनारे फेंक दिया। किसानों की माने तो जल्द स्थिति नहीं सुधरी तो और भी किसान टमाटर फेंकना शुरू कर देंगे। इधर बाजार में टमाटर 1 रुपए किलो में बिक रहा है।

मजदूरी भी नहीं निकाल पा रही

परसुली के किसान भागीरथी पटेल ने बताया टमाटर की कीमत नहीं मिलने से हालत खराब है। स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खेतों से टमाटर तोडऩे की भी मजदूरी नहीं निकाल पा रही है। इसी गांव के विष्णु पटेल, गणेश पटेल, उत्तम साहू का कहना है कि दाम गिरने के कारण कोई खरीदार नहीं मिल रहा है। इसके चलते पिछले 4-5 दिन से गांव के किसान 15 से 20 क्विंटल टमाटर सड़कों पर फेंक रहे हैं।

यहां भी परसुली जैसे ही हालात
परसुली ही नहीं धमधा क्षेत्र के कई गांवों के किसानों ने या तो टमाटर खेत से तोडऩा बंद कर दिया है अथवा सड़कों के किनारे फेंक रहे हैं। धमधा के सिली, कन्हारपुरी, जाताघर्रा, गाड़ाघाट, दानी कोकड़ी, घसरा, खिलोरा, सुखरीकला में 50 फीसदी से ज्यादा किसान टमाटर की खेती करते हैं। यहां भी किसानों ने टमाटर फेंकना शुरू कर दिया है।

दुर्ग मंडी में बिका एक रुपए किलो
गुरुवार को दुर्ग सब्जी मंडी में टमाटर महज एक से दो रुपए किलो तक बिका। जनवरी-फरवरी में लोकल बाडिय़ों से टमाटर की आवक शुरू होती है, यह अप्रैल-मई तक चलता है। इसलिए सामान्य तौर पर इस दौरान टमाटर की कीमत कम हो जाती है, लेकिन इस बार सीजन की शुरूआत में ही कीमत गिर गई है। मंडी में पिछले दो दिनों से कीमत एक रुपए किलो चल रहा है।

इस तरह समझे किसानों के नुकसान को
टमाटर की हाईटेक खेती में एक लाख 40 हजार रुपए प्रति एकड़ तक खर्च आता है। जिले के अधिकतर किसान हाईटेक तरीके से खेती करते हैं।इससे औसत 6 0 से 70 टन प्रति एकड़ उत्पादन आता है।5 रुपएप्रति किलो भी बिका तो इससे 2 लाख50 हजार रुपए आमदनी हो जाती है, लेकिन मौजूदा दर से लागत की आधी कीमत भी नहीं मिल पाएगी।

जिले में कई किसान परंपरागत तरीके से भी टमाटर की खेती करते हैं। उन्हें 67 से 70 हजार रुपए खर्च करना पड़ता है। इस तकनीक से 40 से 50 टन टमाटर का उत्पादन होता है।इससे सामान्य स्थिति में एक से सवा लाख रुपए आमदनी हो जाती है, लेकिन इस बार कीमत की भरपाईनहीं होने की स्थिति बन गई है।