
बीजों से बनाई जा रही इकोफ्रेंडली पेन-पेंसिल, यूज कर फेंकने पर उगेंगे फल-फूल
रायपुर. छत्तीसगढ़ के बस्तर में इको फ्रेंडली पेन का निर्माण किया जा रहा है। इसे उपयोग के बाद फेंक देने से वहां रंग बिरंगे फूल और फलों के पौधे उगते हैं। इस पेन का निर्माण न्यूज पेपर और फल व फूलों के बीजों को मिलाकर किया जा रहा है। उपयोग के बाद फेंकने पर मिट्टी के संपर्क में आने पर पेन का कागज जहां डिस्पोज हो जाता है। वहीं बीज उग जाते हैं।
बस्तर के रहने वाले संतोष माथुर यह काम एक महिला समूह के जरिए कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ सहित देश के अन्य राज्य में बढ़ते प्लास्टिक कचरे को कम करने के लिए उनकी इस पहल की काफी प्रशंसा हो रही है। संतोष महिला समूह के माध्यम से प्रतिदिन 230 पेन का निर्माण कर रहे हैं। लोगों का पेन के प्रति रूझान बढ़े इसके लिए इसके निर्माता में टमाटर, बैगन, गेंदा, तुलसी व गाजर जैसे फल व फूलों के बीज का भी उपयोग किया जाता है।
संतोष का कहना है कि सरकार को इसे दूसरे क्षेत्रों में निर्माण के लिए प्रेरित करना चाहिए। इससे उसका उत्पादन बढ़ेगा और प्लास्टिक कचरे को कम करने में कुछ हद तक कमी लाई जा सकेगी।
देश में निकलने वाले प्लास्टिक कचरे की बात करें तो वह लगभग 56 लाख टन है। वहीं इस कचरे को रिसाइकिल करने की बात करें तो वह लगभग एक हजार टन प्लास्टिक का ही हो रहा है। यह स्थिति काफी चिंताजनक है। केंद्र व राज्य सरकारें इससे निपटने के लिए उपाय खोज रहीं हैं, लेकिन आम लोगों को भी इसमें सहभागिता देनी चाहिए। उन्हें चाहिए कि अधिक से अधिक इको फ्रेंडली वस्तुओं का ही उपयोग होगा।
पर्यावरण विशेषज्ञ नितिन सिंघवी की मानें तो प्लास्टिक के यूज एंड थ्रो पेन से जंग तभी जीती जा सकती है जब इको फ्रेंडली पेन की लागत कम हो। सरकार को चाहिए वह सब्सिडी व टेक्नोलॉजी की मदद से इसे और भी कम करे। बाजार में सस्ते दर पर यूज एंड थ्रो पेन मिलेंगे तो लोग इसे आसानी से अपनाएंगे। इसे प्लास्टिक से फैलने वाला कचरा कम होगा।
बस्तर में बन रहे इको फ्रेंडली पेन को 10 रुपए में बेचा जा रहा है। वहीं लोगों को प्लास्टिक से बने यूज एंड थ्रो पेन दो रुपए से तीन रुपए में मिल रहे हैं। इसके लिए सरकार को भी आगे आने की जरूरत है। यदि वह ऐसी टेक्नालॉजी लाने में मदद करें, जिससे पेन की लागत कम हो सके तो इसकी मांग भी बढ़ेगी।
बीरगांव - 39 टन
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Published on:
17 Aug 2019 10:17 am
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