रायपुर. बॉक्स ऑफिस के लिए शुक्रवार नई फिल्म लेकर आता है। ठीक ऐसे ही न्यू सर्किट हाउस में फ्राइडे सिनेप्रेमियों के लिए बहुत कुछ खास रहा। यह सिलसिला 30 अप्रैल तक जारी रहेगा। यहां छत्तीसगढ़ फिल्म एंड विजुअल आर्ट सोसायटी की ओर से फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत हुई। वैसे तो कार्यक्रम सुबह 11 बजे से शुरू हो गया था लेकिन औपचारिक उद्घाटन शाम को अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी और निर्देशक तनिष्ठा चटर्जी व संस्था के पदाधिकारियों ने किया। पहले दिन कुछ शॉर्ट फिल्में भी दिखाई गईं जिसमें अनंत महादेवन की फिल्म रफबुक और तनिष्ठा चटर्जी निर्देशित फिल्म ‘रोम-रोम’ शामिल रहीं। स्क्रिप्ट राइटर धर्मेन्द्र ओझा ने स्क्रिप्ट राइटिंग पर मास्टर क्लास ली। उद्भव ओझा ने फिल्म संगीत की बदलती दुनिया ‘कल आज और कल’ पर मास्टर क्लास ली।
स्क्रिप्ट ही सिनेमा की बुनिया
स्क्रिप्ट राइटर धर्मेंद्र ओझा ने कहा, 20वीं सदी के एक फिल्मकार एल्फर्ड क्लार्क से जब पूछा गया कि महान सिनेमा बनाने के लिए तीन चीजें क्या जरूरी हैं। उनका जवाब था। पहली चीज होनी चाहिए एक महान स्क्रिप्ट। दूसरी चीज होनी चाहिए एक महान स्क्रिप्ट और तीसरी चीज होनी चाहिए एक महान स्क्रिप्ट। क्योंकि यही बुनियाद है। जब कोई आर्किटेक्ट इमारत बनाता है तो वह नींव की गहराई पर ध्यान देता है क्योंकि उसी पर बिल्डिंग खड़ी रह पाएगी। इसी तरह बेहतरीन सिनेमा के लिए अ‘छी स्क्रिप्ट की जरूरत होती है। कहानी के माध्यम से ही सिनेमा देखा जाता है।
अ‘छी स्क्रिप्ट की पहचान
– कहानी: स्टोरी ऐसी हो जिससे लोग रिलेट कर सकें। ह्यूमन एंगल हो। विषय वस्तु को डेवलप करने के लिए किरदार पर काम करें।
– किरदार: किरदार इंट्रेस्टिंग होंगे तो फिल्म दिलचस्प होगी। किरदार से ही फिल्म आगे बढ़ती है।
प्लॉट: प्लॉट और सब प्लॉट कमाल के होने चाहिए। हर बात का लॉजिक हो। जो भी आप लिख रहे हैं उसका कोई मकसद हो।
स्ट्रक्चर: हर फिल्म में शुरुआत और अंत होता है। जब आप सिनेमा देखते हैं तो एक दुनिया खुलती है। और उसमें आप शामिल हो जाते हैं।
डायलॉग: सिनेमा के डायलॉग चुटीले, छोट, चुस्त और टू द प्वाइंट होने चाहिए। सिनेमा संवाद नहीं है, दृश्य है। उसमें जो संवाद है वह सहायक काम करता है। जहां जरूरत हो वहां संवाद की जरूरत पड़ती है।
कॉर्पोरेट का सिनेमाघरों पर कब्जा
पत्रिका से बातचीत में ओझा ने कहा, अब इंडिविजुअल प्रोड्यूसर खत्म हो रहे हैं, क्योंकि कॉर्पोरेट कंपनियां न सिर्फ फिल्में प्रोड्यूस कर रही हैं बल्कि सिनेमाघरों में भी कब्जा कर चुकी हैं। ऐसे में इंडिविजुअल प्रोड्यूसर अगर फिल्म बना भी लें तो रिलीज कैसे करेंगे। अब तो ओटीटी वाले भी खुद फिल्में बनाने लगे हैं। हालांकि अगर किसी कहानी में नयापन हो, डिफरेंट हो तो वे सपोर्ट करते हैं।