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Bilaspur Tourism: बिलासपुर भ्रमण के दौरान इन शानदार पर्यटन स्थलों मे घूमना न भूलें

Bilaspur Tourism: धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों की बिलासपुर जिले में भरमार है। पुरातत्वविदों और एतिहासिक स्थलों की यात्रा के शौकीनों के लिए यहां बहुत कुछ है। आइए, प्रमुख स्थलों के बारे में जानते हैं।

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Bilaspur Tourism: बिलासपुर छत्तीसगढ़ राज्य का एक जिला है यह राज्य की रायपुर से 111 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। बिलासपुर राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। इन सभी के अलावा इस जिले में कई सारे पर्यटन स्थल हैं जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं इस लेख में हम बिलासपुर जिले के पर्यटन स्थल के बारे में जानेंगे।

मल्हार
मल्हार एक महत्वपूर्ण पुरातत्व स्थल है, यहाँ कई प्राचीन मंदिरों के अवशेष मिलते हैं। प्राचीन काल में यह शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। भारतवर्ष की सबसे प्राचीन मूर्तियों में से एक चतुर्भुज विष्णु जी की मूर्ति है, जिन्हें मंदिर संग्रहालय में रखा गया है। यहां के गौमुख शिवलिंग को भारत के अति प्रचीन शिवलिंग में से एक कहा जाता है । भीम किचक मन्दिर, माता दाई डीड़नेेश्वरी का निवास, ऋषभदेव नाथ मंदिर, भगवान बुद्ध, व महावीर की प्रतिमा इत्यादि मूर्तियां है।देवर मंदिर में कलात्मक मूर्तियों को देखा जा सकता है। यहां एक संग्रहालय है जिसमें पुरानी मूर्तिकला का उत्कृष्ट संग्रह है। यहां से ताम्रपत्र शिलालेख व अनेक मूर्तियां खुदाई से प्राप्त हुई हैं।

लुतरा शरीफ
बाबा सैय्यद इंसान अली शाह की दरगाह के रूप में प्रसिद्ध "लुतरा शरीफ" बिलासपुर में स्थित है। जो पूरे छत्तीसगढ़ में धार्मिक सौहार्द्र, श्रद्धा और आस्था का पावन स्थल तथा प्रमुख केंद्र माना जाता है।ऐसी मान्यता है कि बाबा की मजार में माथा टेकने वालों की मनौतियाँ अवश्य पूरी होती हैं।

रतनपुर
रतनपुर एक धार्मिक एवं प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है, जहां अनेकों मंदिर हैं। इसलिए इसे मंदिरों का शहर भी कहा जाता है। रतनपुर को कल्चुरी वंश के शासन काल में छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी भी घोषित किया गया था। उस समय यहाँ 1200 से भी अधिक तालाब हुआ करते थे। जिसके कारण ही इसे तालाबों का शहर भी कहा जाता था। रतनपुर नगर में अनेक मंदिर हैं लेकिन यह विशेष रूप से महामाया देवी मां के मंदिर के लिए विख्यात है।आदिशक्ति माँ महामाया देवी मंदिर का निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा ग्यारहवीं शताब्दी में कराया गया था |

मंदिर के भीतर महाकाली,महासरस्वती और महालक्ष्मी स्वरुप देवी की प्रतिमाएं विराजमान हैं | मान्यता है कि इस मंदिर में यंत्र-मंत्र का केंद्र रहा होगा | रतनपुर में देवी सती का दाहिना स्कंद गिरा था | भगवन शिव ने स्वयं आविर्भूत होकर उसे कौमारी शक्ति पीठ का नाम दिया था | जिसके कारण माँ के दर्शन से कुंवारी कन्याओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है | नवरात्री पर्व पर यहाँ की छटा दर्शनीय होती है | इस अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा यहाँ हजारों की संख्या में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्जवलित किये जाते हैं |


कानन पेंडारी

बिलासपुर शहर कानन पेंडारी चिड़ियाघर के लिए भी प्रसिद्ध है। यह मुंगेली रोड पर बिलासपुर से लगभग 10 किलोमीटर सकरी के पास स्थित एक छोटा चिड़ियाघर है।वर्ष 2004-2005 में इस जूलॉजिकल गार्डन की स्थापना की गई थी।यहां जीवों की लगभग 70 प्रजातियां हैं जो आगंतुकों को आकर्षित करती हैं।


ताला गांव में खास "देवरानी-जेठानी मंदिर" और "रुद्रशिव"

ताला शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम पर स्थित है। देवरानी-जेठानी मंदिरों के लिए सबसे मशहूर, ताला की खोज 1873-74 में जे.डी. वेलगर ने की थी, जो प्रसिद्ध पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम के सहायक थे । इतिहासकारों ने दावा किया है कि ताला गांव 7-8 वीं शताब्दी ईस्वीं की है।देवरानी-जेठानी मंदिर भारतीय मूर्तिकला और कला के लिए बहुत प्रसिद्ध है।

रुद्रशिव
1987-88 के दरमियान देवरानी मंदिर में खुदाई में भगवान शिव की एक बेहद अनोखी 'रुद्र' छवि वाली मूर्ति प्रकट हुई।यह विशाल एकाश्मक द्विभूजी प्रतिमा समभंगमुद्रा में खड़ी है तथा इसकी ऊंचाई 2.70 मीटर है। यह प्रतिमा शास्त्र के लक्षणों की दृष्टी से विलक्षण प्रतिमा है | इसमें मानव अंग के रूप में अनेक पशु, मानव अथवा देवमुख एवं सिंह मुख बनाये गये हैं | इसके सिर का जटामुकुट (पगड़ी) जोड़ा सर्पों से निर्मित है |

संभवतः मुर्तिकार को सर्प-आभूषण बहुत प्रिय था क्योंकि प्रतिमा में रुद्रशिव का कटी, हाथ एवं अंगुलियों को सर्प की भांति आकार दिया गया है | इसके अतिरिक्त प्रतिमा के ऊपरी भाग पर दोनों ओर एक-एक सर्पफण छत्र कंधों के ऊपर प्रदर्शित है | इसी तरह बायें पैर पर लिपटे हुए, फणयुक्त सर्प का अंकन है |दूसरे जीव जन्तुओं में मोर से कान एवं कुंडल, आँखों की भौहें एवं नाक छिपकली से,मुख की ठुड्डी केकड़े से निर्मित है तथा भुजायें मकरमुख से निकली हैं | सात मानव अथवा देवमुख शरीर के विभिन अंगो में निर्मित हैं। अद्वितीय होने के कारण विद्वानों के बीच इस प्रतिमा की सही पहचान को लेकर अभी भी विवाद बना हुआ है।