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किला अमरगढ़ के शहीद कुंवर जयेंद्रसिंह की शहादत को आज भी करते हैं याद

पुण्यतिथिः गोली लगने के बाद भी हैंड ग्रेनेड दागकर उड़ा दिया था दुश्मन का पूरा मोर्चा

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Martyr Lt. Jayendra Singh

Martyr Lt. Jayendra Singh (Kila Amargharh) story. भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 में हुई जंग के दौरान शहीद हुए राजगढ़ जिले के किला अमरगढ़ में रहने वाले कुंवर जैनेंद्र सिंह की शहादत को बुलाया नहीं जा सकता। क्योंकि उन्होंने बंदूक की गोली लगने के बाद भी दुश्मन के मोर्चे पर हैंडग्रेनेड फेंक कर उसे नेस्तनाबूद कर दिया था।

6 सितंबर 1965 की एक खूनी सुबह थी। जब भारत-पाक सीमा पर दोनों ओर से गोला-बारूद दागने, टैंकों की घरघराहट और राइफल व मशीनगनों की कर्कश आवाजें माहौल को लगातार भयाभय बना रही थीं। दरअसल, सीमा पर अप्रैल के महीने से शुरू हुआ, भारत-पाकिस्तान के बीच छिड़ा युद्ध अब निर्णायक दौर में पहुंच रहा था। दोनों तरफ ही भारी संख्या में सैनिक जान गंवा चुके थे। इस जंग में डोगरा रेजिमेंट भी फ्रंट पर थी, जिसके जांबाज सिपाही, दुश्मनों के दांत लगातार खट्टे कर रहे थे।

इसी रेजीमेंट की 15वीं बटालियन में तैनात लेफ्टिनेंट जयेंद्र सिंह अपनी टुकड़ी के साथ दुश्मन से लोहा ले रहे थे। सुबह के छह बजने को थे और उजाला फैल चुका था। मगर छम्ब (कश्मीर) की घाटी में बारूद के धुएं से आसमान अब भी काला था।

लेफ्टिनेंट जयेंद्र सिंह अपने प्लाटून को लेकर सबसे आगे बढ़ रहे थे। उनका लक्ष्य था कि वे दुश्मन सेना के एलएमजी मोर्चे को ध्वस्त करें, जो भारतीय सेना के आगे बढ़ने के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा था। दुश्मन के एलएमजी मोर्चा को उखाड़ फेंकने के लिए लेफ्टिनेंट जयेंद्र अपनी कोहनी के बल सावधानी से खिसकते हुए आगे बढ़ रहे थे। उनके दोनों हाथों में हैंडग्रेनेड थे। बदकिस्मती से मोर्चे से महज थोड़ी दूरी पर ही दुश्मन खेमे से लगातार बरस रही गोलियों में से एक गोली सीधी आकर उनके शरीर में जा लगी। गोली लगते ही लहू का फव्वारा छूट पड़ा। लेकिन वीर जवान ने अपना दम छूटने से पहले ही अपने हाथों में पकड़े एलएमजी मोर्चे पर दे मारे और उसे ध्वस्त कर दिया। दुश्मन सैनिकों के परखच्चे उड़ गए जिससे टुकड़ी के लिए आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया।

जयेंद्र के नाम से हुआ डेली कॉलेज से जोपीओ चौराहे की सड़क का नाम

शहीद लेफ्टिनेंट जयेंद्र सिंह की स्मृति को चिरस्थाई बनाने के लिए सरकार ने 1966 में इंदौर में डेली कॉलेज से जीपीओ चौराहा तक की सड़क का नाम उनके नाम पर रखा। उनके नाम की पट्टिका भी लगाई गई थी। मगर अव्यवस्था के चलते वो कहां गई, नहीं पता। बाद में इंदौर नगर निगम ने इस पट्टिका को वापस लगाने में रुचि नही दिखाई । राजगढ़ के किला अमरगढ़ में भी पैतृक गड़ी में उनके नाम का एक स्मारक बनाया गया। तत्कालीन शिक्षा मंत्री अर्जुनसिंह इसके लोकार्पण पर आए थे। यहां अब भी उन्हें शहादत और अन्य मौकों पर याद कर श्रद्धांजलि दी जाती है। जिम्मेदारों की रुचि के अभाव में राजगढ़ के इस अमर शहीद की वीर गाथा से उनके अपने क्षेत्र के अधिसंख्य लोग भी अब तक अनजान ही हैं।