
यहां जंगल में ड्रम लेकर दौड़ते हैं बुजुर्ग, पीछे भागते हैं मवेशी
ब्यावरा/माचलपुर. जिला मुख्यालय के आखिरी छोर और राजस्थान की सीमा को छूता माचलपुर से लगा ग्राम डूंगरी दीवाली पर अपनी अनूठी परंपरा के लिए ख्यात है। यहां के लोग विशेष तौर-तरीके से दीवाली मनाते हैं। लक्ष्मी पूजन के अगले दिन यानि पड़वां के दिन तमाम गांव के लोग एक ही जगह (गांव से कुछ दूर स्थित राड़ी) में एकत्रित होकर मवेशियों की पूजा करते हैं।
गांव के वरिष्ठ जन (खासकर बसंतीलाल पाटीदार, नारायणसिंह गुर्जर, रामप्रसाद पाटीदार, कालूराम पाटीदार सहित अन्य...) एक लोहे का ड्रम (डब्बे के आकार) का लेकर आगे दौड़ते हैं और पीछे-पीछे मवेशी दौड़ते हैं। पूरी राड़ी में भैंसें दौड़ती है और इसी क्षण को ग्रामीण एंजाय करते हैं। इस पूरे काम को छोड़़ा कहा जाता है।
छोड़ा पड़वा के दिन आयोजित होता है, पूरे गांव के महिला, पुरुष, बच्चे-बुजुर्ग सभी राड़ी में पहुंचते हैं। इसके बाद राड़ी में ही स्थित भगवान देवनारायण के मंदिर पर पहुंचते हैं। यहां पूजन-अर्चन करने के बाद भगवान को भोग लगाया जाता है।
खुली राड़ी में दोपहर 12 से एक बजे के बीच एक विशेष परंपरा निभाई जाती है, यहां दिन में ही आतिशबाजी भी की जाती है। जिसमें समूचे ग्रामीण बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।
भाईचारा कायम करने व्याप्त है परंपरा
गांव के वरिष्ठजनों की मानें तो तमाम भैंसों और अन्य मवेशियों के लेकर राड़ी में पहुंचने की यह अनूठी परंपरा महज डूंगरी गांव में ही है। इसके अलावा अन्य जगह गांवों में घर पर ही मवेशी पूजे जाते हैं।
बताया जाता है कि इस परंपरा से भाई-चारा कायम रहता है। पूजन और छोड़ा प्रक्रिया के बाद सभी एक-दूसरे से आशीर्वाद लेते हैं। हालांकि बाहर से आने वाले नये शख्स और नई दुल्हनों के लिए यह परंपरा नई है लेकिन जैसे ही इसके बारे में वे जानते हैं तो ढल जाते हैं। इस बार भी इस परंपरा के लिए सूमचे गांव के लोग तैयार हैं।
बुजुर्गों के साथ चल रहे
बुजुर्गों ने जो परंपराएं कायम की उसी के हिसाब से हम यह पर्व मनाते हैं। यहां सालों से भाईचारा कायम है। सभी राड़ी में एकत्रित होकर ही पड़वा का त्योहार उत्साह से मनाते हैं।
- हरिसिंह गुर्जर, सरपंच प्रतिनिधि, ग्राम पंचायत, डूंगरी
मवेशियों की पूजन, उनका भी त्योहार
यह लक्ष्मी पूजा के साथ ही लक्ष्मी स्वरूपा मवेशियों के लिए भी विशेष पर्व है। छोड़ा के माध्यम से मवेशी आनंदित हो जाते हैं। हमारे बुजुर्गों के दौर से ही यह परंपरा चली आ रही है। जिसे सभी ग्रामीण उत्साह के साथ निभाते हैं।
- नारायणसिंह गुर्जर, पटेल, ग्राम डूंगरी (माचलपुर)
Updated on:
26 Oct 2019 09:27 pm
Published on:
26 Oct 2019 09:25 pm
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