
जिमीकंद से बदल रही गांवों की तस्वीर (फोटो सोर्स- पत्रिका)
CG News: साल 2014 में शुरू हुआ जिमीकंद लगाओ, हजारों रुपए कमाओ अभियान आज ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। पहले जहां ग्रामीण जिमीकंद की खेती केवल घरेलू उपयोग और रिश्तेदारों तक सीमित रखते थे। वहीं अब यह फसल आय का मजबूत साधन बन चुकी है। यह अभियान सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण आत्मनिर्भरता, महिला सशक्तिकरण और सामुदायिक विकास का मजबूत मॉडल बन चुका है।
जिमीकंद जैसी पारंपरिक फसल को अपनाकर ग्रामीण न केवल अपनी आय बढ़ा रहे हैं, बल्कि अपने गांव के विकास में भी सक्रिय योगदान दे रहे हैं। ग्रामीण पहले बड़े कंद निकालने के बाद बचे हुए बीज को जमीन में ही छोड़ देते थे, जो दो साल में फिर तैयार हो जाता था। लेकिन इसे कभी व्यवसाय के रूप में नहीं अपनाया गया। इस सोच को बदलने की प्रेरणा मां बम्लेश्वरी से मिली और यहीं से इस अभियान की शुरुआत हुई।
पहले शादी और भोज में जिमीकंद नहीं बनता था। आज हर कार्यक्रम में जिमीकंद की सब्जी अनिवार्य सा हो गया है। कंद की खेती में महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक है। 9,936 महिलाएं इस खेती से जुड़ीं है। जिसमें 1,545 समूह सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। इस अभियान से महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है। हरियाली बहिनी अभियान के प्रमुख शिव कुमार देवांगन के नेतृत्व में यह पहल लगातार आगे बढ़ रही है। 2025 में 32 गांवों में 1000 देसी जिमीकंद लगाने का लक्ष्य और 2027 तक हर गांव में 2 साल में 60,000 रुपए की सामूहिक आय का लक्ष्य रखा गया है।
अभियान के तहत ग्रामीणों को परती भूमि, मेड़ों और बाड़ी में जिमीकंद लगाने के लिए जागरूक किया गया। पदयात्राएं, जनसभाएं और प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से लोगों को जोड़ा गया। उत्कृष्ट कार्य करने वाले समूहों और संगठनों को 1 लाख रुपये तक के पुरस्कार देकर प्रोत्साहित किया गया। इस पहल को तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का भी सहयोग मिला, जिससे अभियान को नई दिशा मिली।
जिमीकंद की खेती जिले के महिला समूह के लिए समृद्ध बनने का जरिया साबित हो रहा है। अब तक 427 गांवों में अभियान का विस्तार किया जा चुका है। जिसमें 32,55,516 जिमीकंद बीज रोपण किया गया है। - शिव कुमार देवांगन, हरियाली बहिनी अभियान प्रमुख
Published on:
23 Mar 2026 08:32 pm
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