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World Water Day: जहां गूंजती थीं गोलियां, अब लहलहा रहे मक्के के खेत… किसान ऐसे बचा रहे पानी

World Water Day: मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिला, जो कभी नक्सलवाद और दहशत गर्दी के गढ़ के रूप में कुख्यात था, अब कृषि क्रांति की एक मिसाल पेश कर रहा है। यहां के किसान पानी की बूंद-बूंद की कीमत समझते हुए धान की पारंपरिक खेती छोड़कर ग्रीष्मकाल में मक्के की खेती की ओर रुख कर रहे हैं।

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किसान (Photo Patrika)

किसान (Photo Patrika)

World Water Day: मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिला, जो कभी नक्सलवाद और दहशत गर्दी के गढ़ के रूप में कुख्यात था, अब कृषि क्रांति की एक मिसाल पेश कर रहा है। यहां के किसान पानी की बूंद-बूंद की कीमत समझते हुए धान की पारंपरिक खेती छोड़कर ग्रीष्मकाल में मक्के की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। इससे न केवल भूजल स्तर की रक्षा हो रही है, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार आ रहा है।

इस क्षेत्र में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा था, क्योंकि अधिकांश किसान खरीफ और रबी दोनों सीजन में धान की खेती पर निर्भर थे। गर्मियों में धान की सिंचाई के लिए डीजल पंपों से भारी मात्रा में भूजल निकाला जाता था, जिसका असर जल संकट के रूप में सामने आया। कृषि विभाग की सलाह और जागरूकता अभियान के बाद किसानों ने फसल चक्र में बदलाव किया। विभाग ने नि:शुल्क मक्के के बीज वितरित कर किसानों को प्रोत्साहित किया, नतीजा यह कि इस ग्रीष्मकाल में लगभग 700 हैक्टेयर भूमि पर मक्के की खेती हुई।

मोहला के गोटाटोला गांव के किसान सूरज मंडावी और विक्रम राजगढ़े बताते हैं कि एक एकड़ धान में जितना पानी लगता है, उतने पानी से हम ढाई एकड़ मक्का उगा रहे हैं। मक्के में पानी की खपत काफी कम है और फसल भी अच्छी आ रही है। इसी तरह औंधी गांव के किसान जगतराम गोंड कहते हैं कि पानी की कमी से धान की फसल प्रभावित होती थी, लेकिन अबमक्के की खेती से न केवल पानी बच रहा है, बल्कि बाजार भी उपलब्ध है। कई कंपनियां सीधे किसानों से मक्का खरीद रही हैं, जिससे उनकी आय में इजाफा हुआ है। घरों में मोटरसाइकिल और अन्य संसाधनों की संख्या बढ़ी है।

जल संरक्षण का उदाहरण दिया

किसान अब समर्थन मूल्य परमक्के की खरीद की मांग कर रहे हैं। कलेक्टर ने शासन को इस संबंध में पत्र लिखा है। यह बदलाव न केवल जल संरक्षण का उदाहरण है, बल्कि नक्सल प्रभावित वनांचल क्षेत्र में विकास और आत्मनिर्भरता की नई दिशा भी दिखा रहा है। जहां कभी बंदूकें गूंजती थीं, वहां अब खेतों में मक्के की हरियाली और किसानों की मुस्कान बिखर रही है। यह पहल छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन सकती है, जहां पानी की बचत और फसल विविधीकरण की जरूरत है।

धान में पानी की खपत अधिक होने से भूजल स्तर पर बुरा असर पड़ रहा था। हम किसानों को जागरूक करमक्के की खेती की ओर प्रेरित कर रहे हैं और इसका सकारात्मक परिणाम दिख रहा है। - जेएल मंडावी, उप संचालक कृषि, एमएमएसी जिला