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थैले में शहीद बेटे की अस्थियां.. 9 साल से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही बुजुर्ग मां, बोलीं- बलिदान को मिले सम्मान

Mothers Day: शहीद बेटे की बुजुर्ग मां 9 साल से सरकारी दफ्तरों के इसलिए चक्कर काट रही कि उसके बेटे के बलिदान को सम्मान मिल सके, ले​किन सरकारी सिस्टम ऐसा है कि…

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Mothers day Special story of chhattigarh

शहीद बेटे के लिए मां का 9 साल से संघर्ष ( Photo - Patrika )

Mothers Day: मोहन कुलदीप. एक मां के लिए उसके बेटे से बढकऱ कुछ नहीं होता। लेकिन जब वही बेटा देश की रक्षा करते हुए शहीद हो जाए, तो उसका दर्द शब्दों में बयान करना आसान नहीं होता। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले की एक बुजुर्ग मां पिछले 9 साल से अपने शहीद बेटे की अस्थियों को एक थैले में संभालकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही है। उसकी बस एक ही मांग है कि उसके बेटे के बलिदान को सम्मान मिले।

Mothers Day: नक्सली हमले में हुआ था शहीद

डोंगरगांव विधानसभा क्षेत्र के सोनेसरार गांव निवासी हेमंत महिलकर वर्ष 2013 में 10वीं बटालियन जिला बल में भर्ती हुए थे। नौकरी के दौरान उनकी तैनाती बीजापुर जिले के मिरतूर थाना क्षेत्र में हुई। 3 मार्च 2017 को चेटली-चितौड़ीपारा इलाके में सडक़ निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा देने गई फोर्स पर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। इस मुठभेड़ में हेमंत महिलकर वीरगति को प्राप्त हो गए।

स्कूल का नाम बेटे के नाम पर हो

जवान बेटे की शहादत की खबर ने पूरे परिवार को तोड़ दिया, लेकिन मां ने अपने बेटे के बलिदान पर गर्व करना नहीं छोड़ा। समय बीतता गया, लेकिन मां के दिल में एक सपना अधूरा रह गया। वह चाहती है कि गांव के स्कूल का नाम उसके शहीद बेटे हेमंत महिलकर के नाम पर रखा जाए और गांव में एक स्मारक बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढियां उनके बलिदान को याद रख सकें। बताया जाता है कि शहीद जवानों के सम्मान में इस तरह के प्रावधान भी मौजूद हैं, लेकिन वर्षों बाद भी उसकी मांग पूरी नहीं हो सकी।

केवल आश्वासन मिल रहा

आज हालत यह है कि बुजुर्ग मां एक थैले में बेटे की अस्थियां लेकर अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर है। हर बार उसे आश्वासन मिलता है, लेकिन जमीन पर कोई पहल दिखाई नहीं देती। मां की आंखों में आंसू हैं, लेकिन उम्मीद अब भी जिंदा है कि एक दिन उसके बेटे को वह सम्मान जरूर मिलेगा, जिसका वह हकदार है। यह सिर्फ एक मां की पीड़ा नहीं, बल्कि उन तमाम परिवारों की कहानी है, जिन्होंने देश और समाज की सुरक्षा के लिए अपने बेटे खो दिए। सवाल यह है कि क्या शहीदों का सम्मान केवल श्रद्धांजलि तक सीमित रह जाएगा, या फिर उनकी कुर्बानी को आने वाली पीढियों तक पहुंचाने के लिए ठोस कदम भी उठाए जाएंगे।

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