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राजसमंद. रेलमगरा के मातृकुण्डिया बांध से जुड़ी समस्याएं अब केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रहीं, बल्कि किसानों के धैर्य और प्रशासनिक संवेदनहीनता की परीक्षा बन गई हैं। बांध से प्रभावित गांवों के किसान पिछले साढ़े चार माह से अधिक समय से बांध के गेटों पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं, लेकिन सरकारी मशीनरी अब तक उनकी सुध लेने नहीं पहुंची है। इधर सरकार द्वारा बांध में हो रहे सीपेज को रोकने के लिए 18 करोड़ रुपए की नई राशि स्वीकृत करने की घोषणा की गई है, मगर आंदोलनरत किसान इसे राहत नहीं बल्कि "सांत्वना" भर मान रहे हैं। किसान आंदोलन के अध्यक्ष माधवलाल जाट के अनुसार, वर्ष 2021 में भी बांध की मरम्मत और सुधार कार्यों के लिए बजट जारी किया गया था। उस दौरान पाल के दोनों ओर जंगलों की सफाई, पाल सुदृढ़ीकरण, चौड़ाई 4.5 मीटर से बढ़ाकर 6 मीटर करना, पेरापेट वॉल निर्माण, कट-ऑफ ट्रेंच बनाकर सीपेज रोकने, ड्रेन निर्माण, सीसी सडक़ों का निर्माण, 52 गेटों की मरम्मत, अपस्ट्रीम गुनाइटिंग, रेस्ट हाउस व भवन मरम्मत, रेलिंग सुधार और पाल पर मुरम सडक़ सहित कई कार्य योजनाबद्ध तरीके से किए गए थे। इसके बाद वर्ष 2023 के बजट में भी प्रदेश सरकार ने सीपेज रोकने के लिए 25 करोड़ रुपए की घोषणा करते हुए मेजा फीडर मरम्मत कार्य स्वीकृत किए। लेकिन किसानों का आरोप है कि कार्य गुणवत्ता पूर्ण नहीं हुए, जिसके कारण समस्या कम होने के बजाय और बढ़ गई।
सीपेज बढऩे का सीधा असर आसपास के गांवों पर पड़ा। इस वर्ष जवा सिया, सांवलपुरा और गुरजनिया सहित कई गांवों के हजारों बीघा खेत बांध से रिस रहे पानी में डूब गए, जिससे खड़ी फसलें सड़ गईं और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
इस वर्ष फिर 18 करोड़ रुपए का बजट जारी किया गया है, लेकिन किसानों का कहना है कि जब तक सीपेज के वास्तविक कारणों का वैज्ञानिक सर्वे नहीं होगा, तब तक कोई भी निर्माण कार्य समस्या का स्थायी समाधान नहीं दे सकता।
स्थिति यह है कि पूर्व में हुए कार्यों के बावजूद मेजा फीडर के गेट टूटे पड़े हैं। सिंचाई विभाग फीडर के मुहाने पर मिट्टी के कट्टे डालकर पानी रोकने का प्रयास कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद पानी लगातार व्यर्थ बह रहा है।
मातृकुण्डिया बांध का जलस्तर गेट खोलकर कम किया जा चुका है। वर्तमान में मौजूद पानी हिन्दुस्तान जिंक तथा रेलमगरा और गंगापुर तहसीलों के लिए रिजर्व बताया जा रहा है। विडंबना यह है कि बांध से इन क्षेत्रों में पानी आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं होने से प्रभावित गांवों को इसका लाभ भी नहीं मिल पा रहा।
बांध भरने पर गिलूण्ड, खुमाखेड़ा, कुण्डिया, कोलपुरा और टीलाखेड़ा गांवों की सैकड़ों बीघा फसलें डूब जाती हैं, जबकि बांध भरने के बाद होने वाले सीपेज से जवासियां, सांवलपुरा और गुरजनिया के खेत जलभराव का शिकार हो जाते हैं। परिणामस्वरूप कई खेतों में खेती करना ही मुश्किल हो गया है।
आंदोलनरत किसानों ने प्रभावित क्षेत्र का उच्च स्तरीय सर्वे करवाकर समस्या का स्थायी समाधान करने की मांग उठाई है, ताकि हर साल दोहराई जा रही इस समस्या से किसानों को राहत मिल सके।
Published on:
26 Feb 2026 01:02 pm
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