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राजस्थान के इस शहर में गेहूं की फसल में दस साल बाद आया यह रोग…पढ़े पूरा मामला

राजसमंद. जिला मुख्यालय के निकट कुछ गांवों में गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग का प्रकोप दिखाई दे रहा है। इसका मुख्य कारण अत्यधिक नमी को माना जा रहा है। कृषि विभाग की टीम ने गांवों का निरीक्षण कर इससे प्रभावित काश्तकारों को बचाव के लिए सुझाव दिए हैं।

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राजस्थान के इस शहर में गेहूं की फसल में दस बाद आया यह रोग...पढ़े पूरा मामला

निकटवर्ती एक गांव के खेत में गेहूं की फसल में फैला पीला रतुआ रोग

जिले में गेहूं की फसल लहलहा रही है। अधिकांश स्थानों पर फसलें पककर तैयार हो गई है, तो पछेती फसलों में सिंचाई का काम जारी है। वर्तमान में फसलों की सिंचाई के लिए राजसमंद से निकलने वाली नहरों से पानी की निकासी जारी है। निकटवर्ती ग्राम भाणा, लवाणा, भगवानदाकला, मंडावर, तासोल, वासोल सहित आस-पास के गांवों में कुछ खेतों में गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग का प्रकोप दिखाई दे रहा है। कृषि विभाग के जानकारों के अनुसार फसलों को आवश्यकता से अधिक सिंचाई करने एवं उसमें लगातार नमी बनी रहने के कारण यह रोग होता है। पिछले एक दशक के बाद गेहूं में यह रोग आना बताया जा रहा है। इससे गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। कृषि विभाग की ओर से इसके लिए उपचार सुझाए गए हैं। उल्लेखनीय है कि रोली रोग उन्न्त व उपचारित बीजों की फसलों में फैल रहा है। ऐसे में इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिए।

आद्र्र मौसम और वर्षा से फैलता रोग
- पीला रतुआ उतरी पहाड़ी क्षेत्र और उत्तरी पश्चिमी मैदानी क्षेत्र का मुख्य रोग है।
- यह रोग सर्वप्रथम रूपनगर, पंजाब और आस-पास के इलाकों में दिसम्बर व जनवरी में होता है।
- अनुकूल वातारण से पंजाब, हरियाणा, जम्मू, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में तेजी से फैलता है।
- ठंडा और आद्र्ध मौसम परिस्थिति, वर्षा, उच्च आद्र्धता के कारण इसका विकास होता है।
पीले रंग की हो जाती है पत्तियां
पीता रतुआ रोग से पत्तियां पीले से नारंगी रंग की धारियां, आमतौर पर नसों के बीच के रूप में दिखाई देती है। संक्रमित पत्तियों को छूने पर ऊंगलियों और कपड़ों पर पीला पाउण्डर या धूल लग जाती है। पहले यह रोग खेत में 10-15 पौधों पर एक गोल दायरे के रूप में शुरू होकर पूरे खेत में फैल जाता है।

यह करें उपाय
- नाइट्रोजन की उच्च खुराक से बचे और उर्वरकों का अनुशासित मात्रा में उपयोग करना चाहिए।
- टेबुकोनाजोल 50 प्रतिशत+ट्राइफ्लोक्सीस्ट्रोविन 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी 0.06 प्रतिशत का छिडक़ाव करना चाहिए। जरूरत पढऩे पर 15 दिनों में छिडक़ाव को दौहराया जा सकता है।
नमी के कारण हो रही परेशानी, किसानों को दिए सुझाव
फसलों को आवश्यकता से अधिक पानी मिलने के कारण इनकी जड़े भी कमजोर हो जाती है। नमी के कारण ही पीला रतुआ रोग होता है। इसके लिए काश्तकारों को पहले भी एडवाइजरी जारी की थी, फिर से निरीक्षण कर किसानों को इससे बचाव की जानकारी दी जा रही है।
- कैलाशचन्द मेघवंशी, संयुक्त निदेशक कृषि (वि.) राजसमंद