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मातृकुंडिया बांध में गिलूंड के हक का 170 एमसीएफटी रिजर्व पानी, कस्बे तक पहुंचाने की कोई योजना

बारिश के वक्त तीन तरफ से पानी घिर जाता है कस्बा, फिर भी सालभर रहता है प्यासा

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रेलमगरा तहसील क्षेत्र की सबसे बड़ी आबादी गिलूण्ड में है। यह बस्ती बारिश के वक्त बनास में आते उफान, मातृकुण्डिया बांध के लबालब होने के कारण तीन तरफ से पानी से घिर जाता है, लेकिन यहां की आबादी की दशकों पुरानी पेयजल समस्या का कोई तोड़ अब तक नहीं निकाला जा सका है।
वैरों का मठ से निकली बनास नदी विभिन्न छोटे बड़े जलाशयों को भरकर मेवाड़ के हरिद्वार नाम से प्रख्यात तीर्थस्थली मातृकुण्डिया में बने मेजा जलपूरक बांध को भरकर आगे बढ़ती है। मातृकुण्डिया बांध की कुल भराव क्षमता में से 170 एमसीएफटी पानी हिन्दुस्तान जिंक दरीबा के लिए आरक्षित है, वहीं 50 एमसीएफटी पानी को बांध के आगे की नदी को रिचार्ज करने के लिए छोडऩे का प्रावधान है। इसके अलावा 170 एमसीएफटी पानी गिलूण्ड क्षेत्र में पेयजल सुविधा के लिए आरक्षित रखने का प्रावधान कुछ समय पहले हुआ था।

बांध का आरक्षित पानी गिलूण्ड तक पहुंचाने की कोई योजना नहीं बनने से कस्बेवासियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। गिलूण्ड के लिए आरक्षित पानी का उपयोग हिन्दुस्तान जिंक करता है अथवा मेजा बांध को भरने के लिए छोड़ दिया जाता है। वर्षों से यह पानी गिलूण्ड की पेयजल व्यवस्था के नाम पर आरक्षित है, लेकिन कस्बे के उपयोग में कभी नहीं आया।

करोड़ों की योजना बनी, अब निरस्त कर दी
जन स्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग ने वर्ष 2021-22 में गिलूण्ड में पेयजल के लिए करीब पौने छह करोड़ रुपयों की योजना बनाकर इसका बजट भी स्वीकृत करा दिया। कस्बे के दो क्षेत्रों में खुले कुएं भी खोदे गए, लेकिन उस दौरान इन कुओं में पानी नहीं होने से योजना को निरस्त करना पड़ा। विभागीय अधिकारियों ने योजना को फिर स्वीकृत कराने के प्रयास किए, लेकिन सरकार ने पुरानी योजनाओं को निरस्त कर दिया है।

डीएमएफटी से मिल सकता है पैसा
फिलहाल नई योजना के प्रस्ताव बनाए जा सकते हैं, लेकिन अगर राज्य सरकार बजट उपलब्ध नहीं करवाती है, तो इसके लिए डीएमएफटी का पैसा स्वीकृत कराया जा सकता है। कस्बे में पेयजल के लिए बनास नदी एवं नली क्षेत्र में कुएं खुदे हुए हैं, जिनमें पर्याप्त पानी है। वहां से संपूर्ण कस्बे में पानी की 24 घंटा आपूर्ति की जा सकती है, लेकिन यहां बनी मात्र एक टंकी से पूरी आबादी में प्रतिदिन पेयजल आपूर्ति असंभव है। एक और टंकी निर्माण की दरकार है।

दो दिन के अंतराल में आता है पानी, वॉल्व से व्यर्थ बह जाता है
कस्बे में भरपूर पानी होने के बावजूद दो दिनों के अंतराल में पेयजल की आपूर्ति की जाती है। यहां विभाग की बिछाई भूमिगत पाइपलाइन आबादी की तुलना में बेहद छोटी है, वहीं जगह-जगह लगे वॉल्व खुल गए हैं, जिसके पेयजल आपूर्ति के दौरान अधिकांश पानी सडक़ों पर व्यर्थ बहता रहता है। क्षतिग्रस्त पाइपलाइन एवं लीकेज वॉल्व से पेयजल आपूर्ति होने से किसी मोहल्ले में दिनभर नलों से पानी आता है तो कहीं पानी टपके वर्षों बीत गए हंै। अधिकांश मोहल्लों में बेहद कम दबाव से पानी पहुंचने की वजह से उपभोक्ताओं को सडक़ों पर गड्ढे खोदकर पेयजल भरना पड़ता है।

यह है भौगोलिक स्थिति
गिलूण्ड कस्बे के एक ओर बहती बनास नदी तो दूसरी ओर मातृकुण्डिया का बांध स्थित है। तीसरी दिशा में बस स्टैण्ड पर मुख्य तालाब और एनिकट है तो एक ओर नदी का बहाव क्षेत्र है। ऐसे में यहां चारों ओर पानी ही पानी उपलब्ध है। बारिश के दिनों में जब ये सभी लबालब होते हैं और बारिश लगातार होती है तो कस्बे के आबादी क्षेत्र तक पानी पहुंचने का खतरा मण्डराता रहता है। उसके बावजूद यहां के लोग पेयजल के लिए तरस रहे हैं।

इनका कहना है...
गिलूण्ड में स्वीकृत पेयजल योजना के तहत खोदे गए कुओं में पानी नहीं होने से योजना निरस्त कर दी गई थी। उसके बाद विभाग द्वारा पेयजल की समस्या से अवगत कराते हुए पुन: नवीन योजना स्वीकृत कराने के दस्तावेज तैयार कर भिजवाए गए हैं, लेकिन अभी तक कोई स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है।
देवेन्द्रकुमार, कनिष्ठ अभियंता, जन स्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग, रेलमगरा

गिलूण्ड के लिए बनी योजना की शर्त थी कि कुओं में पानी होना चाहिए। खोदे गए कुओं में पर्याप्त पानी नहीं होने से योजना अधूरी रही। वर्तमान सरकार के एक आदेश के प्रभाव में यह योजना निरस्त हो गई है। बांध में संरक्षित पानी के सम्बंध में रिकॉर्ड निकलवाकर समस्या का उचित समाधान किया जाएगा।
लोकेश वर्मा, सहायक अभियंता, जन स्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग, रेलमगरा