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कुंभलगढ़ दुर्ग की 200 साल पुरानी जेल को बनाया टॉयलेट, इतिहास संरक्षण मॉडल सवालों के घेरे में

Kumbhalgarh Heritage Issue: कुंभलगढ़ दुर्ग में इतिहास संरक्षण को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पर्यटकों और स्थानीय लोगों को हैरान कर दिया है। विश्व विरासत दुर्ग की तलहटी में स्थित करीब 200 वर्ष पुरानी रियासतकालीन जेल की बैरकों को अब महिला और पुरुष शौचालय में बदल दिया गया है।
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राजसमंद

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Anand Prakash Yadav

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ओमप्रकाश शर्मा

•

Updated: 26 May 2026, 12:56 PM IST

Kumbhalgarh Fort Rajsamand

कुंभलगढ़ फोर्ट में रियासतकालीन जेल की बैरक को बनाया टॉयलेट

Kumbhalgarh Heritage Controversy: कुंभलगढ़ दुर्ग में इतिहास संरक्षण को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पर्यटकों और स्थानीय लोगों को हैरान कर दिया है। विश्व विरासत दुर्ग की तलहटी में स्थित करीब 200 वर्ष पुरानी रियासतकालीन जेल की बैरकों को अब महिला और पुरुष शौचालय में बदल दिया गया है। कभी जहां कैदियों और स्वतंत्रता सेनानियों को नजरबंद रखा जाता था, वहां आज फ्लश और टाइल्स नजर आ रहे हैं। यही कारण है कि यह मामला अब संरक्षण बनाम सुविधा के सवालों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

सुविधा के नाम पर शौचालय में तब्दील

जानकारी के अनुसार जेल परिसर में बनी करीब 10 बैरकों में से चार बैरकों को भारतीय पुरातत्व विभाग ने वर्षों पहले पर्यटकों की सुविधा के नाम पर शौचालय में तब्दील कर दिया। वहीं अन्य कमरों में पुलिस चौकी और कर्मचारियों के निवास संचालित हो रहे हैं। इससे यह ऐतिहासिक जेल अब पर्यटकों की नजरों से लगभग ओझल हो चुकी है।

दुर्ग में तैनात कर्मचारियों के मुताबिक पहले परिसर में अलग स्थान पर शौचालय बनाए गए थे, लेकिन बाद में वहां बेबी केयर रूम बना दिया गया। इसके बाद जेल की बैरकों को ही शौचालय के रूप में उपयोग में लेना शुरू कर दिया गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि परिसर में अन्य स्थान उपलब्ध होने के बावजूद ऐतिहासिक बैरकों को शौचालय में बदलना समझ से परे है। लोगों का तंज है कि शायद विभाग को लगा होगा कि अब कैदियों की जगह विधाएं बंद कर दी जाएं।

क्या है पूरा मामला

  • रियासतकालीन जेल की करीब 10 बैरकें मौजूद
  • इनमें से 4 बैरकों को बनाया गया शौचालय
  • अन्य कमरों में पुलिस चौकी और कर्मचारियों के निवास
  • पहले अलग स्थान पर बने थे शौचालय
  • बाद में उसी स्थान पर बना बेबी केयर रूम

स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ा है यह परिसर

मेवाड़ के स्वतंत्रता सेनानियों पर शोध करने वाले दिनेश श्रीमाली बताते हैं कि वर्ष 1931 में नाथद्वारा के स्वतंत्रता सेनानी माणिक्यलाल वर्मा को अंग्रेजों ने कुंभलगढ़ में नजरबंद किया था। उनका उद्देश्य उनकी गतिविधियों को नियंत्रित करना और आंदोलन को कमजोर करना था। इसके बाद वर्ष 1938 में प्रोफेसर नारायणदास बागोरा के नेतृत्व में राजसमंद और नाथद्वारा के 16 स्वतंत्रता सेनानियों को भी यहां रखा गया था। बताया जाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ऐसे कई अवसर आए, जब अंग्रेजों ने सेनानियों को नजरबंद रखने के लिए कुंभलगढ़ को चुना।

आखिर कुंभलगढ़ ही क्यों चुना जाता था?

अरावली की ऊंची पहाड़ियों पर बसे इस दुर्ग से मेवाड़ और मारवाड़ दोनों की सीमाओं पर नजर रखी जा सकती थी। उस दौर में यह इलाका इतना दुर्गम माना जाता था कि दुश्मन यहां पहुंचने की कल्पना तक नहीं कर पाते थे। कुंभलगढ़ किला की विशाल दीवार दुनिया में चीन की दीवार के बाद दूसरी सबसे लंबी दीवार मानी जाती है, जो इसकी सुरक्षा को और मजबूत बनाती थी।

खूंखार अपराधियों से लेकर राजनीतिक बंदियों तक का ठिकाना

दुर्ग में बने जेलनुमा सात कमरों में ब्रिटिश शासन के दौरान राजनीतिक बंदियों और स्वतंत्रता सेनानियों को खुली जेल में रखा जाता था। ब्रिटिश जेल मैन्युअल के अनुसार उन्हें वहां नमक और रोटी दी जाती थी।इतिहासकारों के अनुसार इससे पहले मेवाड़ स्टेट के शासनकाल में कई खूंखार अपराधियों को भी कुंभलगढ़ की इसी जेल में रखा जाता था।

विभागीय कर्मचारी क्या बोले

नाम नहीं छापने की शर्त पर विभागीय कर्मचारियों ने स्वीकार किया कि संबंधित कमरे रियासतकालीन जेल की बैरकें ही थीं और वर्तमान में वहां शौचालय संचालित हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर कुछ भी कहने से कर्मचारी बचते नजर आए।

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