
राजस्थान की यह खास नदी इन दिनों है उफान पर
खमनोर. कुंभलगढ़ की पहाडिय़ों के बीच बसे वेरों का मठ इसका उद्गम स्थल माना जाता है। मठ की गोद से निकलने वाली इस नदी को वन की आशा कहा गया है। इस नदी के किनारे बसे गांव, खेत-खनिहान सदियों पहले घने वन के रूप में दिखाई पड़ते थे। बारहों महीना बहने वाली नदी इसके किनारों पर बसे जंगलों की उम्मीद थी। वन की आस के शाब्दिक युग्म से ही इसका नाम बनास पड़ा। ये नदी राजस्थान की प्रमुख नदियों में से एक है। कालांतर में बनास नदी का स्वरूप अनेक कारणों से सिमटा है। मगर फिर भी मानसून के दौर में बादल जब दिल खोलकर पहाड़ों में बसरते हैं तो बरबस की नदी की कल-कल ध्वनि का नाद होने लगता है। नदी की गोद से बहता पानी कई छोटे-मोटे जलाशयों को भरते हुए आगे बढ़ता जाता है। नदी और जलाशय मनुष्य, जीव-जंतुओं की प्यास बुझाते हैं। इसके जल से अगणित भू-भाग पर फसलें लहलहाती हैं। इस वर्ष भी मेघ कुछ ऐसे बरसे की नदी की रौनक लौट आई है। बाघेरी नाका और नंदसमंद बांध भरकर बनास अब पहाड़ी और मैदानी इलाकों में कल-कल करती बह रही है। बनास का वेग मध्यम गति का बना हुआ है। अगले कुछ महीनों तक यूं ही बना रहेगा। बारिश से जलप्रवाह शुरू होने पर बनास नदी के किनारे हरियाली छा जाती है। सैंकड़ों कुओं का जलस्तर ऊपर आ जाता है। फसलों की जीवनदायिनी बन जाती है। पहाड़ों से उतरकर मैदानी इलाकों में बलखाती हुई बहती बनास नदी की खूबसूरती देखते ही बनती है।
Published on:
24 Aug 2022 10:32 am
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