5 अप्रैल 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है पुष्टिमार्गीय कीर्तन संगीत

गेस्ट राइटर कॉलमडा. राकेश तैलंग, शिक्षाविद् एवं पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी

2 min read
Google source verification
भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है पुष्टिमार्गीय कीर्तन संगीत

भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है पुष्टिमार्गीय कीर्तन संगीत

राजसमंद.
पुष्टिमार्गीय
मन्दिरों की सर्वाधिक मनभावन कलाओं का जिक्र करते समय श्रीवल्लभाचार्य द्वारा वि.सं. 1556 में श्रीनाथजी की सेवा परम्परा के आगाज के साथ सर्वप्रथम ब्रजवासी कुंभनदास द्वारा प्रभु की राम सेवा का दायित्व ग्रहण किया जाने का जिक्र करना उचित होगा। उनका कंठ स्वर बहुत मधुर था और कृष्ण भक्त होने के साथ वे सतत् अभ्यासी भी थे। यह भी कि गोपालपुर (जतीपुरा) में श्रीनाथजी के प्राकट्य के समय ब्रज के लोक जीवन में संगीत अपने लोक तत्वों के साथ ग्राम्यांचल में सर्वत्र व्याप्त था। अष्टछापी कीर्तनकार इसी पृष्ठभूमि से उभरे थे, जिन्हें वल्लभाचार्य और वि_लनाथ द्वारा प्रोत्साहित, प्रशिक्षित और परिष्कृत किया गया था।
वि.सं. 1556 से कुंभनदास ने पुष्टिमार्ग की हवेली में कृष्ण भक्ति को लीला गायन के रूप में प्रारम्भ किया था, जो आगे चलकर वि.सं. 1568 में सूरदास व कृष्णदास की इस संगीत यात्रा में सम्मिलित हो जाने के साथ भक्तों और संगीतज्ञों के आकर्षण का कारण बन गई। वि.सं. 1642 तक समस्त आठ कीर्तनकार कवियों ने गोस्वामी वि_लनाथ के निर्देशन में महाप्रभु वल्लभाचार्य की दार्शनिक परम्पराओं को कीर्तन सेवा में समाहित कर लिया था। कहा जा सकता है कि वि.सं. 1556 से 1642 तक के समय में अष्टधाम के कवियों ने कृष्ण लीलाओं को अपने पदों का विषय ही बना दिया था। इस अवधि में श्रीनाथजी सहित ब्रज के अन्य मन्दिरों में भी विभिन्न राग-रागनियों में गाए पद साहित्य और संगीत के संसार में एक अभिनव इतिहास की रचना करते रहे। कीर्तनियों की मण्डली में एक विशेष गायन शैली के रूप में हवेली संगीत स्थापित हो गया। केवल पुष्टिमार्ग के आठ कवि ही नहीं, अन्य पुष्टिमार्गेत्तर कवियों ने भी लीला गायन की पदावलियों को अपनाया। वि.सं. 1726 सम्पूर्ण ब्रज में पुष्टि मार्ग की राज सेवा को अत्यधिक सम्मान के साथ लोकाश्रय व राज्याश्रय मिलता रहा।
मंगला, शृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, आरती और शयन में ठाकुरजी की सेवा के तीन विशेष पक्ष भोग, शृंगार व राग पर कन्द्रित व्यवस्था को बहुत व्यापक परिदृश्य प्रदान किया गया है। अष्टछापी कीर्तनकार कवियों की रूचियों का ध्यान रखते हुए उन्हें विशेष रूप से आठ झांकियों में से एक के लीला गायन के लिए नियुक्त किया गया था। मंगला के लिए परमानन्ददास, शृंगार के लिए नन्ददास, ग्वाल के लिए गोविन्द स्वामी, आरती के लिए छीत स्वामी और शयन के लिए कृष्णदास।
जैसा कि विदित है, कीर्तन संगीत की मूल अवधारणा समयानुकूल रागों की भावमय प्रस्तुतियों में छिपी हुई है। माना जाता है कि असमय किसी राग को गाने से 'राग हिंसाÓ होती है। ऐसा मानकर इन कीर्तनों के गायन में समयानुकूल राग के प्रयोग का सदैव आग्रह रहा। सम्भवत: इसीलिए मंगला में ललित, भैरव, विभास, बिलावल, शृंगार में बिलावल, गुणकली, रामकली, ग्वाल में रामकली, देवगंधार, टोढ़ी, आसावरी, राजभोग में आसावरी, देसी सारंग, उत्थपन में धनश्री, भीमपलासी, संध्या भोग में श्री, जैतश्री और शयन में यमन, कामोद, केदार, विहाग- यह आग्रह रहता है।
विशेष तथ्य यह भी है कि इन कीर्तनों की गायन शैलियां मुख्यत: ध्रुपद और धमार है। यह तत्कालीन मुगल और ***** शासकों को प्रिय रही। धमार शैली तो पुष्टिमार्गीय हवेलियों का विशेष रूचि क्षेत्र है, जिसकी बानगी होली व डोल में देखी जा सकती है। यह हमारी सांगितिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय धरोहर है, पर इस युग में बार-बार चर्चा होनी चाहिए, जिससे आने वाले समय में यह कोरा किताबी अनुसंधान का विषय बन कर न रह जाय। उचित संरक्षण, प्रशिक्षण, समझ और सम्प्रयोग के साथ सम्मानजनक रोजगार से सम्बद्धता के अभाव में अपने मूल रूपाकार से भ्रमित होती जा रही इस कला की फुलती सांसों को प्राण वायु की जरूरत है। क्या सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का दम भरने वाले जिम्मेदार इस दिशा में तनिक भी ध्यान देंगे?