
Video : जीवन जीने की कला है योग
राकेश गांधी
राजसमंद. जिन्दगी में योग का विशेष महत्व है। हालांकि भारत में योग प्राचीन परम्परा रही है। यहां के ऋषि मुनि योग के बूते आजीवन स्वस्थ रहे। पिछले कुछ सालों से योग को विश्व के दूसरे देश भी स्वीकार करने लगे ेहैं, जिससे अब कई देशों में योग की नियमित कक्षाएं भी लगने लगी है। एक तरह से भारतीय जीवन शैली का योग के जरिए प्रसार हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 दिसम्बर 2014 को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की मान्यता प्रदान की थी। तब से हर साल 21 जून को योग दिवस एक थीम के आधार पर मनाया जाने लगा है। चूंकि इस बार कोरोना वायरस महामारी का संकट चल रहा है, ऐसे में इस बार घर में रहते हुए परिवार के साथ योग करने का आह्वान किया गया है। 21 जून को योग दिवस मनाने का भी विशेष महत्व है। यह दिन साल का सबसे बड़ा दिन होता है, जब सूर्य जल्दी उदय होकर देर शाम को ढलता है। राजस्थान पत्रिका ने योग दिवस के महत्व को लेकर यहां के योग प्रशिक्षकों से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश-
योग से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना संभव
कोविड-19 के समय में जब मनुष्य की सारी दिनचर्या प्रभावित हुई है, ऐसे हालात में योग से न केवल रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सकती है, बल्कि जीवन जीने की कला भी सीखी जा सकती है। योग एक विज्ञान है, जीवन जीने की कला है, जिसके जरिए प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को निरोगी एवं व्यवस्थित बना सकता है। योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग का वर्णन है। इसके यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि योगों का पालन करते हुए हम निरोगी एवं स्वस्थ रह सकते हैं। यम के द्वारा सामाजिक जीवन व नियम के द्वारा व्यक्ति का जीवन व्यवस्थित होता है। आसन व प्राणायाम द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। दैनिक जीवन में हम कुछ आसनों एवं प्राणायाम द्वारा अपने जीवन को स्वस्थ व संयमित रख सकते हैं। इनमें ताड़ासन, वृक्षासन, पाद हस्तासन, त्रिकोणासन आदि खड़े होकर किए जाने वाले आसन है। बैठकर किए जाने वाले आसनों में मण्डूकासन, शशांकासन, उष्ट्रासन आदि। पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में मकरासन, भुंजगासन व शलभासन आदि तथा पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, मर्कटासन, अद्र्धहलासन, कन्धरासन आदि है। इसी प्रकार प्राणायामों में भस्त्रिका प्राणायाम, कपालभाति क्रिया, अनुलोम-विलोम प्राणायाम, भ्रामरी शीतली, सील्कारी, उज्जयी एवं ध्यान के द्वारा अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकते हैं। इन आसन प्राणायामों से हमारे फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है। कोरोना वायरस भी हमारे श्वसन तंत्र पर ही प्रभाव डालता है। अत: यदि हम रोजाना 30 से 45 मिनिट उक्त आसन प्राणायाम आदि का अभ्यास करेंगे तो कोरोना वायरस का हमारे शरीर पर प्रभाव नहीं होगा।
- करतारसिंह, योग प्रशिक्षक
चिंतन-चरित्र-व्यवहार का परिष्कार करना ही योग का उद्देश्य
हम सभी को उस दिव्य भारत भूमि में जन्म लेने का सौभाग्य मिला, जहां योग की महान परम्परा का प्रादुर्भाव हुआ। आसान-प्राणायाम से शुरू होकर जीवन को लघुता से महानता की ओर ले जाने वाला साधन योग हैं। व्यक्तित्व की उत्कृष्ठता के साथ चिंतन-चरित्र-व्यवहार का परिष्कार करना ही योग साधना का मूल उद्देश्य हैं। आज के पावन दिन जब हम सभी उमंग-उल्लास से योग दिवस मना रहे हैं, संकल्प ले कि योग हम सभी के जीवन का एक अविभाज्य अंग बने। आज पूरा विश्व कोविड-19 से त्राहि त्राहि कर रहा हैं। कहीं न कहीं हम प्रकृति के प्रति कृतघ्न हो गए। यह उसी का दुष्परिणाम हैं। यौगिक जीवनशैली ही अब इन समस्त सामयिक समस्याओं का समाधान हैं। योग परम्परा घर-घर में स्थापित हो। उमंग-उल्लास-आत्मीयता से भरा हम सभी का जीवन योगमय विश्व निर्माण में मील का पत्थर बनें, यहीं मंगल प्रार्थना।
- हिमांशु पालीवाल, रिसर्च स्कॉलर, योग
योग जीवन जीने का सही तरीका है
स्वस्थ और निरामय रहने के लिए योग हमारे जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। योग केवल शरीर ही नहीं आत्मा के लिए भी उतना ही जरूरी है। योग को शरीर के साथ मन और चित्त के लय से पूर्ण स्वास्थ्य और जीवन में स्थिरता लाता है। सबसे पहले हमें यह समझने की जरूरत है कि स्वस्थ रहना कोई विचार या काम नहीं है, यह तो हमारे सही जीवन जीने का तरीका है। निरोगी और स्वस्थ रहने के लिए तीन बातों को हमेशा ध्यान में रखना आवश्यक है- हम क्या सोचते हैं, हम क्या करते हैं (हमारे शरीर, चित्त और आंतरिक ऊर्जा के साथ) व हम किस तरह भोजन करते हैं। प्रतिदिन सकारात्मक विचारधारा के साथ अपने शरीर, चित्त और ऊर्जा का सही और पूरी तरह उपयोग में लेने से और सही समय पर सही भोजन को मात्रानुसार करके स्वस्थ रह सकते हैं। हमें योग को अपने जीवनशैली में अपनाकर एक स्वस्थ जीवन की शुरुआत करनी चाहिए।
- विजया वैष्णव, योग प्रशिक्षक
योग के साथ ध्यान भी जरूरी
मानसिक तनाव को रोकने की प्रक्रिया ही ध्यान है। ध्यान के द्वारा शक्ति की जो बचत होती है, उसका अधिकांश लाभ मस्तिष्क के ज्ञान केंद्र को मिलता है। योग के बाद इसे अपनाया जाए तो इसका महत्व दुगुना हो जाता है। बौद्धिक स्तर से ऊपर उठकर अध्यात्म की गहन अनुभूतियों का साक्षात्कार कराने वाली यह एक अपूर्व शक्ति है। आज मानव का शारीरिक, मानसिक विकास तो बहुत हो गया, लेकिन भावनात्मक विकास में पिछड़ता जा रहा है। यही कारण है अवसाद, डिप्रेशन, आत्महत्या जैसी समस्याएं निरंतर बढ़ती जा रही है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी दिनचर्या में प्रतिदिन 15 मिनट ध्यान करें तो इस समस्या से बच सकता है। महाप्राण ध्वनि या ओम ध्वनि का प्रयोग कर मानसिक शक्ति का विकास किया जा सकता है। दीर्घ श्वास के प्रयोग द्वारा क्रोध आवेश शांत होते हैं। जिस प्रकार सूर्य की बिखरी हुई किरणों से कागज या कपड़ों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन जब उन्हें कॉन्वेक्स शीशे के द्वारा एकत्रित कर लिया जाता है तो वह कागज एवं कपड़े को जला डालती है। उसी प्रकार जब मनुष्य अपने मन को चारों ओर से हटाकर केवल एक कार्य की पूर्ति में लगा देता है तो उसे निश्चित सफलता मिलती है।
- डॉ सीमा कावडिय़ा, प्रेक्षा प्रशिक्षक
Published on:
21 Jun 2020 08:24 am
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