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देश का ऐसा इलाका जहां नहीं चलती भारतीय मुद्राएं,हजारों की किमत के उत्पाद के बदले लेते है चावल,जानिए क्या है वजह!

शहरों में रहने वाली नई पीढ़ी को शायद यह मालूम नहीं होगा कि किसी जमाने सामान के बदले सामान मिलता था, एक सामान दो और बदले में दूसरा सामान लो। वस्तु विनिमय प्रणाली की यह सदियों पुरानी परंपरा आज भी एशिया के सबसे घने जंगल सारंडा में बरकरार है

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Tribal area

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रवि सिन्हा की रिपोर्ट.........

(रांची): शहरों में रहने वाली नई पीढ़ी को शायद यह मालूम नहीं होगा कि किसी जमाने सामान के बदले सामान मिलता था, एक सामान दो और बदले में दूसरा सामान लो। वस्तु विनिमय प्रणाली की यह सदियों पुरानी परंपरा आज भी एशिया के सबसे घने जंगल सारंडा में बरकरार है। साल के पेड़ यहां की पहचान है, कुछ वर्ष पहले तक यहां घने जंगलों के कारण धरती पर सूर्य की किरण नहीं पड़ती थी। लेकिन दुनिया की नजर जब धरती में छिपे लौह अयस्क और साल (सखुआ पेड़) की कीमती लकड़ियों पर पड़ी, तो देश-दुनिया की कई छोटी बड़ी कंपनियां क्षेत्र में सक्रिय हो गयी। बड़ी-बड़ी कंपनियों के आने से यहां रोजगार का सृजन या लोगों के जीवन स्तर में सुधार नहीं हुआ, बल्कि जंगलों में रहने वाले जनजातीय परिवार जो वनोत्पाद पर निर्भर थे, उनकी आजीविका ही मुश्किल में पड़ गयी।


इनके लिए नहीं है पैसे का कोई मोल

उड़ीसा की सीमा से सटे सारंडा के घने जंगलों में रहने वाले लोगों की कहानी ऐसी है, जिसे सुनने के बाद यह यकीन करना मुश्किल हो जाएगा कि आज पाई-पाई के लिए भाई-भाई का कत्ल करने वाली दुनिया में ऐसे लोग भी रहते है, जिनके लिए पैसे का कोई मोल नहीं है। सारंडा के बड़ाजामदा के हाथी चौक से होते हुए गुवा-सलाई पथ पर सड़क किनारे चिरौंजी निकालती एक महिला गोईबारी सुरीन और उनके बच्चों से मुलाकात हुई। मुंडारी और हो भाषा बोलने वाले सारंडा के इस घने इलाके के ये लोग मजबूरी में हिन्दी भाषा बोलते है।

हजारो की किमत के ड्राई फ्रूट के बदले लेते है चावल


शहरों से भूले-भटके इस रास्ते से गुजरने वाले कई लोग बाजार में करीब 1800 रुपये प्रति किलोग्राम बिकने वाली ड्राई फ्रूट चिरौंजी को खरीदना चाहते है, लेकिन ये सीधे-साधे गरीब लोगों के लिए 500 या 2000 रुपये के नोट से ज्यादा कीमती चावल ही है। एक कटोरा चिरौंजी (ड्राईफ्रूट) के बदले बाजार में 22-25 रुपये प्रतिकिलो बिकने वाले चावल मांगते है। एक कटोरा चिरौंजी के बदले इलाके में सक्रिय दलाल या स्थानीय दुकानदार इन्हें 10 कटोरा चावल (एक किलोग्राम चिरौंजी के बदले आठ-दस किलोग्राम चावल) देकर खरीदारी कर लेते है और बदले में भारी मुनाफा वसूल कर लेते है। इस वजह से नहीं लेते उत्पाद के बदले में पैसा


इस वजह से नहीं लेते उत्पाद के बदले में पैसा

ऐसी बात नहीं है कि इन्हें 500 या 2000 रुपये के नोट के बारे में जानकारी नहीं है, बल्कि इनकी विवशता है कि ये गरीब आदिवासी बाहर से आने वाले किसी व्यक्ति से नकद नहीं लेते है। यदि ये आदिवासी परिवार नकद ले लेंगे और फिर उस पैसे से स्थानीय दुकानदार से सामान खरीदने पहुंचेंगे, तो दुकानदार को पता चल जाएगा कि चिरौंजी को इन लोगों ने उन्हें देने के बजाय किसी और बेच दिया है। इससे नाराज स्थानीय दुकानदार उन्हें अनाज या अन्य सामान नहीं देगा और पुराने बकाये की मांग करने लगेगा।


नहीं मिल पा रहा सरकारी योजनाओं का लाभ

केंद्र सरकार हर गरीब परिवारों तक उज्ज्वला योजना का लाभ पहुंचाने की बात कर रही है, लेकिन हकीकत यह है कि सड़क किनारे बसे घरों तक अभी तक इस योजना का लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। बड़ाजामता-गुवा पथ पर रहने वाले गोईबारी सुरीन ने अपने पति की बीमारी से मौत के बाद अन्य गांव वालों के साथ मिलकर सड़क निर्माण के लिए अंगूठा लगाकर अपनी सहमति जरुर दे दी, लेकिन हकीकत यह है कि इस सड़क से उन्हें फायदा नहीं मिलने वाला है, बल्कि जंगल से लौह अयस्क और कीमती लकड़ी को सड़क मार्ग से ढोकर ले जाने वाले लोगों को इसका फायदा मिलने वाला है। गांव के धन्नु मुंडा ने बताया कि सरकार ने डोभा जरुर खुदवा दिया, लेकिन ठेकेदारों ने ऐसी जगह डोभा (छोटा तालाब) खुदवाया, जिसमें पानी नहीं रहता, हैंड पंप भी बेकार है और पानी के लिए अब भी उन्हें सुदूरवर्ती क्षेत्र में बहने वाली नदियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

सरकार की ओर से ऐसे गरीब परिवारों को एक रुपये की दर पर 35 किलोग्राम अनाज देने की योजना बनायी गयी है। लेकिन हकीकत है कि इन तक महीने में सिर्फ 6 से 8 किलोग्राम चावल ही पहुंच पाता है, बाकी के अनाज बिचौलिये और दलाल खा जाते है। ऐसे में घने जंगलों में रहने वाले पांच-छह सदस्यों के परिवार को चलाना कितना मुश्किल है, सिर्फ उन्हें ही पता है।