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कोयल की मौत से शुरू हुई शिबू सोरेन की अहिंसक यात्रा, संघर्ष को हथियार बनाकर यूं तय किया अपना राजनीतिक सफर

तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके दिशोम गुरू नौंवी बार लोकसभा पहुंचने की तैयारी में जुटे...  

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shibu soren

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(रांची): अलग झारखंड राज्य के करीब तीन दशक तक हिंसक और संघर्षपूर्ण आंदोलन करने वाले दिशोम गुरू शिबू सोरेन ने नौ वर्ष की आयु में ही उस वक्त पूरी तरह से अहिंसा धर्म अपना लिया, जब उनके पिता सोबरन सोरेन की भूल के कारण घर में पलने वाली चिड़ियां भेंगराज (कोयल) की मौत हो गई।


सोबरन सोरेन दशहरा के दिन अपने घर में बैठ कर मोर का पंख निकाल रहे थे, उस वक्त भेंगराज बार-बार उनके पैर पर चोंच मार कर उन्हें परेशान कर रही थी। चिड़िया के बार-बार झिड़कने के बावजूद उनके पैर में आकर चोंच मारने से परेशान शिबू सोरेन के पिता ने अपनी बंदूक की नोंक से जब भेंजराज को झिड़कने का प्रयास किया, तो भेंगराज की मौत हो गई। थोड़ी देर बाद जब शिबू सोरेन को अपनी प्यारी चिड़ियां की मौत का पता चला, तो वे उसे जिन्दा करने की मांग अपने पिता से करने लगे। इस दौरान शिबू सोरेन ने घर में रखा फरसा उठा लिया और अपने पिता को ही मारने दौड़े, बाद में शिबू सोरेन के बड़े भाई ने किसी तरह से समझा-बुझा कर उन्हें शांत किया। उसके बाद शिबू सोरेन ने बांस का खटिया बनाया और कफन आदि की व्यवस्था कर चिड़ियां का दाह-संस्कार किया। इस घटना ने शिबू सोरेन को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया और उन्होंने मांस-मछली तथा जीव हत्या को पाप मान कर पूरी तरह से अहिंसा धर्म अपना लिया।


शिबू सोरेन अपने बड़े भाई राजाराम सोरेन के साथ गोला स्थित आदिवासी छात्रावास में रहकर पढ़ाई कर रहे थे, इसी बीच गांव के महाजनों से विवाद की वजह से उनकी पिता सोबरन सोरेन की हत्या कर दी गई। जिसके बाद शिबू सोरेन ने महाजनी प्रथा के खिलाफ बड़े आंदोलन की शुरुआत की और आदिवासी समाज में जनजागृति लाने के लिए अभियान प्रारंभ किया। आश्रम में रहने के दौरान ही उन्हें जनजातीय समाज की ओर से दिशोम गुरु की संज्ञा दी गई। अलग झारखंड राज्य आंदोलन के दौरान संताल परगना, छोटानागपुर, कोयलांचल और कोल्हान इलाके में उनकी इतनी तूती बोलती थी, सिर्फ नगाड़े (पारंपरिक वाद्य यंत्र) की आवाज सुनकर ही लोग शिबू सोरेन के संदेश को सुनने के लिए एकत्रित हो जाते थे। कई वर्षों के संघर्ष, झारखंड बंद, आर्थिक नाकेबंदी, ट्रेन रोको अभियान समेत सैकड़ों आंदोलनों के बाद 15 नवंबर 2000 को जब अलग झारखंड राज्य का गठन हुआ, तो वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री नहीं बन पाए, जिसके कारण उनके समर्थकों और एक बड़ी आबादी अलग राज्य के जश्न से दूर रही। लेकिन बाद में शिबू सोरेन को राज्य में तीन बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला, परंतु विभिन्न कारणों से उनका कार्यकाल लंबा नहीं रहा। बाद में शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन भी मुख्यमंत्री बने।

शिबू सोरेन ने 1980 में दुमका से लोकसभा का पहला चुनाव जीता, बाद में वे 1989, 1991, 1996, 2002, 2004, 2009 और 2014 में भी दुमका संसदीय क्षेत्र से चुने गए और इस बार भी उन्होंने चुनाव मैदान में उतरने का संकेत दिया है। इस दौरान शिबू सोरेन वर्ष 2002 में राज्यसभा के लिए भी चुने गए। जबकि यूपीए सरकार में दो बार वे केंद्र में मंत्री भी रहे।