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जानिए कैसे, अपनी ड्रीमगर्ल को घर में ही दें पर्ल

मनचाही आकृति के प्राकृतिक मोती (पर्ल) चाहिए तो एक बार झारखण्ड आइए....सीखिए, सिखाइए और खुद भी कमाइए। सिर्फ गोल व लम्बे ही नहीं, जैसे बोलेंगे, वैसे मिलेंगे मोती। अब झारखंड में ही उत्पादन शुरू। खुद आत्मनिर्भर बन औरों को भी सिखाएंगे।

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घर में ही दें पर्ल

घर में ही दें पर्ल

मोती ( PEARL) के उपयोग से मन व दिमाग शांत रहता है। मोती आपने गोल व लंबे बहुत देखे होंगे, लेकिन मनचाही आकृति वाले मोती तैयार करने की दिशा में अब झारखण्ड में पहली बार काम हो रहा है। यहां के लोगों को असली मोती की खरीदारी के लिए अब दूसरे राज्यों के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा। राज्य के ही किसानों ने मोती उत्पादन ( PEARL FARMING)कार्य शुरू कर दिया है और मोती उत्पादन से किसान आत्मनिर्भर बन रहे हैं।
(रांची). घर-घर में हर पत्नी का सपना होता है कि उसका पति उसके लिए हीरे-जवाहरात लाए। इस सपने को अब साकार करने का बेहतर अवसर इंटरनेट के युग में आसान हो गया है। एक वर्ष के सतत प्रयास से आप भी घर बैठे मोती (पर्ल) की खेती कर सकते हैं और ना सिर्फ पत्नी के लिए मोतियों का असली हार तैयार कर सकते हैं, बल्कि इसे आजीविका का साधन बनाकर स्वरोजगार के रूप में भी अपना सकते हैं, कैसे यह संभव है, जानने के लिए झारखण्ड के सुभाष महतो की लगन व मेहनत को इस खबर में देखिए...


सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया प्रखंड अंतर्गत चामारू पंचायत के रंगामाटिया गांव के किसान सुभाष महतो ने इंटरनेट से मोती उत्पादन की जानकारी हासिल की और घर के निकट छोटे से डोभा में मोती उत्पादन शुरू किया। कुछ ही दिन में उन्हें बड़ी सफलता मिली और वे आज मोती उत्पादन से पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं। सुभाष महतो के डोभा में करीब आठ हजार मोतियों का उत्पादन किया जा रहा है। अगले वर्ष अप्रेल-मई तक यह अपना पूर्ण रूप धारण कर लेगा।

मोती उत्पादन से क्षेत्र में मिली विशेष पहचान

महतो के अनुसार वर्तमान में पूरे झारखण्ड में सिर्फ दो लोगों ने ही इसका उत्पादन शुरू किया है। इसमें एक वे स्वयं है, जबकि दूसरे हजारीबाग के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा किए जा रहे मोती उत्पादन से उन्हें क्षेत्र में अलग पहचान मिली है।

ऐसे शुरू हुआ सफर

इंटरनेट से उन्हें मोती (सीप) उत्पादन की जानकारी मिली। इंटरनेट में दिए गए पते पर सम्पर्क कर उन्होंने मोती उत्पादन प्रशिक्षण लेने की इच्छा जताई। इसी वर्ष जनवरी में उन्होंने कोलकाता के मेचोदा में 15 दिन का प्रशिक्षण लेकर मोती उत्पादन के काम को परीक्षण के तौर पर शुरू किया। इसमें सफल होने पर वे अगले वर्ष से युवाओं को प्रशिक्षण देकर मोती (सीप) उत्पादन से स्वरोजगार को बढ़ावा देने का प्रयास करेंगे।

आठ हजार मोती दिखेंगे अप्रेल-मई में

मोती उत्पादन को लेकर अब तक करीब 1.30 लाख रुपए खर्च किए गए हैं। इस राशि से आठ हजार मोती (सीप) का उत्पादन किया जा रहा है। मोती तैयार होने में 12 से 14 माह लगते हैं। आठ माह गुजर गए हैं, अप्रेल-मई माह में मेहनत का फल दिखने लगेगा।

अभी कोलकाता से मंगाते हैं कच्चा माल
वर्तमान में कोलकाता से ही सीप (झिनुक), कच्चा पाउडर व अन्य सामग्री लानी पड़ती है। कच्चे पाउडर को लॉकेट रूप देकर सांचा में लोगों के लिए मोती का बीजा तैयार कर मोती बनने के लिए चीप में डाला जाता है।

घोंघा के शरीर में बनते हैं सीप
समुद्र में रहने वाले घोंघा प्रजाति के छोटे से प्राणी के पेट में सीप बनते हैं। कोलकाता से सीप लाने के बाद उसे सप्ताह भर डोभा में पानी में व्यवस्थित होने के लिए छोड़ते हैं। फिर सर्जरी से लॉकेट आकार के मोती का बीजा सीप में डालते हैं। उसके बाद कुछ दिन एंटीबाइटिक पानी में रखते है। फिर उसे डोभा में छोड़ दिया जाता है। सीप में डाले गए बीजा पर विशेष पदार्थ की परत चढ़ती है। यह पदार्थ कैल्शियम कार्बोनेट होता है, जो जीव के अंदर बनता है। धीरे-धीरे यह सफेद चमकीला रूप ले लेता है वहीं मोती कहलाता हैं।

सरकारी स्तर पर भी मिले सुविधा
मनचाही आकृति के मोती तैयार करने की दिशा में झारखण्ड में जो कार्य हो रहा है उसे लघु उद्योग के रूप में बढ़ावा देने की सभी को पहल की जानी चाहिए। सरकारी स्तर पर भी सहयोग नहीं मिलने से आर्थिक परेशानी होती हैं। सरकार को इस नव व्यवसाय को बढ़ावा देते हुए तमाम जरूरी सुविधाएं व आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता देनी चाहिए।