
अखंड ज्ञान आश्रम में दिव्य चातुर्मास महोत्सव में स्वामी विशोकानंद भारती ने कहा सनातन की चेतना किसी एक कालखंड तक बंधी नहीं है, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के प्रतीक विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में भी दिखाई देते हैं।
रतलाम. शिवोऽहम् सनातन का आधार हैं, सनातन की मूल चेतना आत्मज्ञान में निहित है और शिवोऽहम् उसका बोध कराने वाला महत्वपूर्ण सूत्र है। भक्ति केवल बाहरी प्रदर्शन तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि साधक को आत्मचिंतन और अध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढऩा चाहिए। मनुष्य के सामने जीवन में हमेशा दो मार्ग होते हैं। प्रेय तत्काल सुख और आकर्षण देता है, जबकि श्रेय अध्यात्मिक उन्नति और आत्मकल्याण की ओर ले जाता है।
स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित अखंड ज्ञान आश्रम में दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत यह विचार शुक्रवार को आचार्य विशोकानंद भारती ने व्यक्त किए। भारती ने सुबह कठोपनिषद का स्वाध्याय और शाम श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
भक्ति के स्वरूप में कई स्थानों पर आडंबर बढ़ गया
प्रवचन में आचार्य विशोकानंद भारती ने कहा कि वर्तमान समय में कथा और भक्ति के स्वरूप में कई स्थानों पर आडंबर बढ़ गया है। भक्ति का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को भीतर से संस्कारित करना और परमात्मा से जोडऩा है। आचार्य विशोकानंद ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए हुआ।
मूल आध्यात्मिक स्वरूप को पहचानने की आवश्यकता
उन्होंने कहा कि समाज में बढ़ते वैचारिक मतभेदों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने मूल आध्यात्मिक स्वरूप को पहचानने की आवश्यकता है। सनातन की चेतना किसी एक कालखंड तक बंधी नहीं है, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के प्रतीक विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में भी दिखाई देते हैं।
प्रेय और श्रेय का किया विवेचन
कठोपनिषद के संदर्भ में आचार्य विशोकानंद ने प्रेय और श्रेय का विवेचन करते हुए कहा कि मनुष्य के सामने जीवन में हमेशा दो मार्ग होते हैं। प्रेय तत्काल सुख और आकर्षण देता है, जबकि श्रेय अध्यात्मिक उन्नति और आत्मकल्याण की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि परिवार, संसार और सांसारिक सुख-सुविधाएं प्रेय हैं, जबकि आत्मिक उन्नति के लिए किया गया पुरुषार्थ श्रेय का मार्ग है। मनुष्य को दोनों के बीच विवेकपूर्वक चयन करना चाहिए।
गुरुकुल परंपरा का किया उल्लेख
उन्होंने गुरुकुल परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी गुरु के सानिध्य में रहकर शिक्षा, अनुशासन, संस्कार और जीवन-मूल्यों का ज्ञान प्राप्त करता था। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को विद्वान, संस्कारी और विवेकशील बनाना होना चाहिए। प्रवचन के बाद आरती की गई तथा श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरित की गई।
Updated on:
14 Aug 2026 09:03 pm
Published on:
14 Aug 2026 08:55 pm
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