
रतलाम। दूध उत्पादन के क्षेत्र में रतलाम आत्मनिर्भर बन रहा है तो पांच साल की तुलना में १२-१५ प्रतिशत उत्पादन में वृद्धि हुई है वहीं गुणवत्ता में भी काफी सुधार आया है। जिले में पशु पालन विभाग की माने तो जिले में इस समय १ लाख ९६ हजार ९६२ दुधारू गोवंशी और भैंसवंशीय पशु है और प्रतिदिन रतलाम में १ लाख १० हजार लीटर दूध पहुंचता है वहीं १ लाख लीटर तक खपत भी हो जाता है। पशु पालन विभाग की माने तो जिले में पांच साल पहले १४८.३२ हजार मेट्रिक टन दूध का उत्पादन हो रहा था, वहीं वर्तमान में २३३.३ हजार मेट्रिक टन का उत्पादन हो रहा है। इसके साथ ही रतलाम के दूध से बनने वाले मावा, दही, म_ा, मिठाई की अन्य प्रदेशों के अलावा जिलों में भी काफी मांग है। दूध उत्पादक कृषक बाला पटेल ने बताया कि रतलाम में गुणवत्ता युक्त दूध आ रहा है। उत्पादन १२-१५ प्रतिशत उत्पादन बड़ा है, दूध उत्पादन को लेकर पशुपालन के क्षेत्र में शासकीय योजनाओं से लाभ लेकर किसानों की रूचि बड़ी है, रतलाम में प्रतिदिन १ लाख १० हजार किलो लीटर दूध रतलाम पहुंच रहा है, जबकि पिछले पांच साल पहले ९०-९५ हजार लीटर दूध पहुंच रहा था।
रतलाम के मावे की भी अलग पहचान
रतलाम का मावा भी अपनी अलग ही पहचान रखता है, जिसकी मांग शहर सहित आसपास के सभी राज्यों में काफी रहती है। मांगलिक कार्यों और सीजन के समय बहुतायात मात्रा में ट्रेन-बसों से मावा अन्य स्थानों पर पहुंचता है। भंडारी मावा वाले के अनुसार रतलाम में १४ से अधिक मावा दुकानें है, जहां पर १२-१५ गांवों से करीब रतलाम ५०० से अधिक क्विंटल मावा प्रतिदिन पहुंचता है। सीजन में मांग के अनुसार आवक भी बड़ जाती है। जिले से दाहोद-गोधरा के अलावा मुंबई, राजस्थान के अलावा प्रदेश अधिकांश जिलों तक पहुंचता है।
कई शहरों में हैं रतलाम के दूध और मावे की मांग
जिले में दूध का उत्पादन बड़ी मात्रा में बड़ रहा है। इसके अलावा किसान भी पशुपालन के क्षेत्र में आगे आ रहे हैं। गायों में भारतीय नस्ल की अधिक मांग है। इसमें गीर, साहीवाल, मालवी आदि देशी नस्ल को अधिक पसंद किया जा रहा है। भैंस में मुर्रा अधिक पसंद की जा रही है। किसानों के लिए पशु पालन के क्षेत्र में काफी योजनाएं भी चल रही है जिनका लाभ लेकर फायदा उठा सकते हैं।
एके राणा, उप संचालक पशु पालन विभाग, रतलाम
Published on:
11 Jan 2018 05:58 pm
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