
datia news (भाई ने की भाई की हत्या Photo Source- Patrika)
फोटो-आरटी-2906- विक्रम हाजरा, आध्यात्मिक संगीतकार
रतलाम। संगीत जब केवल कानों तक सीमित नहीं रहता और धीरे-धीरे भीतर उतरने लगता है, तब वह मनोरंजन से आगे बढ़कर अनुभव बन जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित आध्यात्मिक संगीतकार विक्रम हाजरा इसी अनुभव की तलाश में संगीत को साधना से जोड़ते हैं। अच्युतम् केशवम् जैसे लोकप्रिय भजन को लिखने और गाने वाले हाजरा ने भक्ति संगीत को एक ऐसी सांगीतिक पहचान दी है, जिसमें भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और आधुनिक वाद्य-संरचना एक-दूसरे से संवाद करती दिखाई देती है। उनके लिए संगीत मंच पर होने वाली प्रस्तुति भर नहीं, बल्कि स्वयं से बाहर निकलकर किसी बड़े अनुभव में प्रवेश करने की प्रक्रिया है। पत्रिका से बात करते हुए उन्होंने संगीत, अध्यात्म, प्रसिद्धि, अहंकार, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर खुलकर बात की। पिछले दिनों रतलाम आए विक्रम से पत्रिका ने लंबी बात की, प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश।
पत्रिका : क्या आपको कभी लगा कि परंपरा और प्रयोग के बीच कोई अदृश्य लक्ष्मण-रेखा भी होती है?
विक्रम : इलेक्ट्रिक गिटार की अपनी एक खासियत है। उस पर आप श्रुतियां बजा सकते हैं, मींड लगा सकते हैं। वास्तव में संगीत की कई ऐसी बारीकियां हैं, जो हारमोनियम पर संभव नहीं हो पातीं। लेकिन इलेक्ट्रिक गिटार को भक्ति संगीत के अनुकूल बनाना अपने आप में एक यात्रा रही है। इसके लिए मुझे वाद्य में कई तरह के बदलाव करने पड़े। मेरे लिए प्रयोग का अर्थ परंपरा को तोड़ना नहीं है। बल्कि कोशिश यह है कि परंपरा की आत्मा को बनाए रखते हुए उसे अभिव्यक्ति का नया माध्यम दिया जाए।
पत्रिका : भजन में आखिर सबसे अधिक महत्वपूर्ण क्या है?
विक्रम हाजरा : मेरे लिए ये सभी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि आप केवल भाव के भरोसे गाएं। आपका सुरीला होना भी आवश्यक है। शब्द का अर्थ समझना भी जरूरी है और भाव का होना भी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भजन का अर्थ ही बांटना है। आप जो अनुभव कर रहे हैं, उसे केवल अपने तक सीमित नहीं रखना, बल्कि संगीत के माध्यम से दूसरे तक पहुंचाना यही उसकी सार्थकता है।
पत्रिका : क्या आध्यात्मिक संगीत भी कभी केवल मनोरंजन बन जाने के खतरे में पड़ सकता है?
विक्रम हाजरा : बिल्कुल। जिस दिन आप तालियों के लिए परफॉर्म करना शुरू कर देते हैं, उसी दिन आपके भीतर का कलाकार थोड़ा-थोड़ा नष्ट होने लगता है। विशेष रूप से आध्यात्मिक संगीत में आपके भीतर की स्थिरता और भक्ति आपके संगीत में भी दिखाई देनी चाहिए। अगर भीतर कुछ और है और मंच पर आप कुछ और प्रस्तुत कर रहे हैं, तो वह अंतर अंततः संगीत में दिखाई देने लगता है।
पत्रिका : व्यूज, लाइक्स और फॉलोअर्स किसी की पहचान को प्रभावित करता है?
विक्रम हाजरा : मैं मानता हूं कि एल्गोरिदम एक बहुत खतरनाक चीज हो सकता है। हम किसी कलाकार को केवल उसके व्यूज या फॉलोअर्स के आधार पर समझने लगते हैं। एल्गोरिदम आपकी पूरी पहचान नहीं जानता। वह केवल आपके डिजिटल व्यवहार का एक हिस्सा देखता है।
सवाल : रियाज और अध्यात्म में समानता दिखाई देती है?
विक्रम हाजरा : स्वर-साधना अपने आप में उतनी ही महत्वपूर्ण आध्यात्मिक साधना हो सकती है। मुझे ऐसे-ऐसे महान कलाकारों के दर्शन हुए हैं, जो संगीत में इतने ऊंचे स्तर पर पहुंच चुके हैं कि उनके पास बैठकर आपको लगता है जैसे आप किसी संत के पास बैठे हों। वे संगीत में इतने तल्लीन रहते हैं कि उनकी पूरी जीवनशैली अत्यंत सरल हो जाती है। जब साधना गहरी होती है तो उसका प्रभाव केवल आपकी कला पर नहीं, आपके जीवन पर भी पड़ता है।
Updated on:
29 Aug 2026 06:01 am
Published on:
29 Aug 2026 06:01 am
