6 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

icon

प्रोफाइल

Prajapita Brahma Kumari Meditation Camp- परमात्मा से जुडऩा ही राजयोग: ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

रतलाम। विकारो को छोडऩा व अपनी पूर्व कमजोरी को समाप्त कर परमात्मा से प्यार करना व उनसे जुडऩा ही राजयोग है । ‘ध्यान’- ध्यान की सबसे सहज विधि है प्रेम से भरी बातें परमात्मा से करना। परमात्मा से अपनी दिल की बाते करना, भिन्न संबंधों से, गहराइयों के साथ अनुभव करना ही ध्यान है।

2 min read
Google source verification
patrika

ratlam news patrika

जब तक परमात्मा से संबंध नहीं जोड़ेगे तब तक आप अपनी दिल की बात नहीं कह पाएंगे, भारीपन रहेगा। यह विचार ब्रह्माकुमारीज़ डोंगरे नगर की ओर से लायंस हॉल में आयोजित आध्यात्मिक सात दिवसीय विशेष राजयोग अनुभूति शिविर ‘बढ़ते कदम खुशी की ओर’ शिविर के पांचवे दिन ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी ने कही।

राजयोग और ध्यान के बारे में बताया


राजयोग और ध्यान के बारे दीदी ने बताया कि ‘राजयोग’-राज माना अपनी कर्मेन्द्रियों पर शासन करना और योग माना जुडऩा, परमात्मा से जुडऩा। जैसे राजा अपनी प्रजा पर शासन करता है ठीक वैसे ही आत्मा अपने कर्मेन्द्रियों पर कन्ट्रोल करती, जिसे हम कंट्रोलिंग पावर एवं रुल्लिंग पावर भी कहते है । राजयोग में ही संन्यास योग, भक्ति योग, बुद्धि योग, समत्व योग कर्मयोग, हठयोग भी शामिल है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में साधक उपस्थित रहे। अंत में दीदी ने सभी भाई बहनों को राजयोग मेडिटेशन का भी अभ्यास कराया। केंद्र की मुख्य संचालिका सविता दीदी ने बताया कि शिविर सुबह ७.३० से ९ और शाम ७ से ८.३० बजे तक आयोजित हो रहा है।

आत्मा एक ज्योति बिंदू स्वरूप है


दीदी ने कहा कि आत्मा एक ज्योति बिंदू स्वरूप है और परमात्मा भी ज्योति बिंदू स्वरूप है जब दोनों का एक स्वरूप है तो संबंध भी एक होना चाहिए,परमात्मा के परिचय के आधार पर संबंध जुड़ा होता है तो उस आधार पर सर्वप्राप्ति का अनुभव भी होता है।राजयोग को ज्ञानयोग व समत्व योग भी कहते है ज्ञान रहता है तो अहंकार भी आता है ज्ञान है भावना नहीं है तो अहंकार आने की संभावना बढ़ जाती है। भावना ज्यादा होने से भी कई बार अंधविश्वास भी उत्पन्न भी हो जाता है, भावना और ज्ञान का बैलेंस होना बहुत जरूरी है, इसलिए राजयोग को समत्व योग भी कहते हैं। केवल ज्ञान हो भावना ना हो तो काम नही चलेगा अगर भावना हो ज्ञान नही हो तो चल सकता है क्योंकि भगवान को भावना प्यारी लगती है शायद हम भावना की गहराई में होते होते ज्ञान की गहराइयों में पहुंच जाते है।