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तमाम योजनाओं के बाद भी सरकारी स्कूलों से पांच साल में 31 हजार बच्चे गायब

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू होने से बच्चे हो गए कम

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स्कूल हैं लेकिन किसी में बच्चे पूरे नहीं आते तो कहीं शिक्षक क्लास में नहीं मिलते, निरीक्षण में खुली पोल

रतलाम। स्कूलों में पढऩे वाले विद्यार्थियों के लिए शासन की तमाम योजनाओं के बावजूद सरकारी प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार घटती जा रही है। हालात ये हैं कि पिछले सालों के आंकड़ों को देखें तो महज पांच साल में ही सरकारी स्कूलों से 31 हजार से ज्यादा विद्यार्थी गायब हो गए हैं। ये बच्चे कहां गए हैं इसका जवाब सरकारी मशीनरी के पास नहीं है। जो जवाब दिया जाता है वह कुछ ऐसा है जो रटारटाया ही रहता है। जो जवाब मिलता है वह यह है कि शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लागू होने से बच्चे कम हो गए हैं।
सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार हर साल गिरती जा रही है। कहीं भी बढ़ोतरी के न तो आसार दिखाई दे रहे हैं और न ही संख्या बढ़ रही है। वर्ष 2013-14 में जिले में पौने दो लाख बच्चे प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ रहे थे जो घटकर 2017-18 में 1 लाख42 हजार तक आ गए हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों में पढ़ाई का स्तर कितना है और कितने पढ़ रहे हैं।
जनसंख्या में लगातार साल-दर-साल बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। पांच साल पहले जिले की जनसंख्या 13 लाख से कुछ ज्यादा थी जो बढ़कर अब 15 पहुंच गई है। ये आंकड़े बढ़ती जनसंख्या दर के आधार पर सामने आता है। हर साल इसी आधार पर जनसंख्या की गणना की जाती है। वहीं सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। अधिकारियों का यह कहना कि आरटीई लागू होने के बाद बच्चोंं की संख्या कम हो रही है बेमानी लगती है।
एक साल में ही 13 हजार कम हुए
सरकारी स्कूलों में पांच साल में ३१ हजार 188 विद्यार्थी कम हुए हैं यहां तक तो ठीक है किंतु वर्ष 2014-15 और 2015-16 के बीच महज एक साल में ही साढ़े 12 हजार से ज्यादा विद्यार्थी सरकारी स्कूलों में से कम हो गए हैं। इसके अगले साल भी करीब दस हजार विद्यार्थी कम हो गए। सरकार और सरकारी स्कूलों के लिए यह बहुत ही चिंताजनक है कि सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के आंकड़े दिन प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं।
आरटीई में भर्ती हो रहे हैं बच्चे
शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद निजी स्कूलों में बड़ी संख्या में गरीब वर्ग के बच्चों का प्रवेश हो रहा है। जहां तक सरकारी स्कूलों का सवाल है तो इनमें ज्यादातर गरीब परिवार के बच्चे ही पढऩे आते हैं जबकि कुछ सक्षम परिवारों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। यह सही है कि पिछले सालों में बच्चों की संख्या सरकारी स्कूलों में कम हो रही है। ये आंकड़़े पोर्टल पर दर्ज विद्यार्थियों के हैं। हो सकता है कुछ बच्चों के नाम पोर्टल पर दर्ज नहीं हो तो वे छूट जाते हैं।
आरके त्रिपाठी, प्रभारी डीपीसी, रतलाम