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हाइकोर्ट के आदेश पर सज्जन मिल की सम्पत्ति का कब्जा लिया

53 बीघा जमीन सहित सज्जन मिल परिसर की संपत्ति का मामला

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हाइकोर्ट के आदेश पर सज्जन मिल की सम्पत्ति का कब्जा लिया

हाइकोर्ट के आदेश पर सज्जन मिल की सम्पत्ति का कब्जा लिया

रतलाम. इंदौर हाईकोर्ट के आदेश पर विभागीय लिक्विडेटर (सम्पत्ति बेचकर लोन चुकाने की प्रक्रिया का जिम्मेदार) ने मंगलवार को सज्जन मिल की सारी संपत्ति और जमीन को अपने कब्जे में ले लिया। मिल कर्मचारी और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का एक वसूली से संबंधित केस हाईकोर्ट इंदौर में चल रहा था और मिल की 389. 25 बीघा जमीन कर्ज के एवज में एसबीआई के पास दृष्टि बंधक थी। जिसमें 159 बीघा पर वर्तमान में तालाब है और बाकी 53 बीघा जमीन मिल के पास मौजूद है जिस पर फैक्ट्री और कर्मचारी कॉटेज बने हुए हैं। यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि पूर्व में जो जमीन बिक चुकी है वह भी एसबीआई के पास वर्तमान में अभी तक बंधक है। एसबीआई का कर्ज चुकाने के लिए इंदौर हाई कोर्ट ने उक्त सारी संपत्ति और जमीन को बेचने के निर्देश लिक्विडेटर को दिए हैं। इंदौर हाई कोर्ट के ऑफिशल लिक्विडेटर व्योमेश सेठ और सहायक लिक्विडेटर राहुल पगारे के साथ सिक्योरिटी की टीम एसबीआई का स्टाफ और वैल्यूर जयंत वोरा एंड कंपनी की टीम थी। बनाई गई लिस्ट में 62 किराएदार पाए गए जिनको ओने पौने दामों में सांठगांठ कर बेशकीमती संपत्तिया किराए पर दी गई है। उक्त सारी संपत्ति का कब्जा लिक्विडेटर द्वारा लेकर अपना सिक्योरिटी स्टाफ तैनात कर दिया गया है।

एडीएम को लगाई लताड़

बताया जाता है कि हाईकोर्ट इंदौर का उक्त आदेश पिछले 18 सितंबर का है और उक्त आदेश की परिपालना में मंगलवार को लिक्विडेटर का रतलाम आना तय था इसकी सूचना जिला प्रशासन को 15 अक्टूबर को दे दी गई थी, लेकिन 18 अक्टूबर को रतलाम आने के बाद लिक्विडेटर ने जिला प्रशासन को कब्जा लेने के संबंधित कई फोन लगाएं लेकिन कोई रिस्पांस नहीं दिया। फटकार पर एडीएम एम एल मौर्य मौके पर पहुंचे। दोनों के बीच बहस भी हुई। एडीएम ने कब्जा पंचनामा पर साइन नहीं किए। आखिर हाइकोर्ट का हवाला दिया तो साइन किए।

रतलाम की जीवनरेखा कहलाने वाली सज्जनमिल रतलाम महाराजा सज्जनसिंह द्वारा दी गई भूमि पर १९२९ में प्रारंभ हुई थी। १९५७ में इस मिल को एस एन अग्रवाल परिवार ने अपने संचालन में लिया था और इसके बाद कई दशकों तक यह मिल रतलाम के हजारों परिवारों के जीवन यापन का एकमात्र आधार बनी रही। १९८० तक यह मिल लाभ देने वाली मिल थी। लेकिन इसके बाद अनेक कारणों के चलते मिल घाटे में जाने लगी और १९८६ में घाटे के कारण इसे बन्द कर दिया गया। अनेक आन्दोलनों और श्रमिकों के संघर्ष के बाद इस मिल को राज्य शासन ने अपने अधिकार में ले लिया और इसका संचालन फिर से शुरु हुआ। एमपी स्टेट टैक्सटाईल कारपोरेशन लिमिटेड का सरकारी प्रबन्धन इसे घाटे से नहीं उबार पाया और आखिरकार सन १९९६ में सज्जनमिल पूरी तरह बन्द हो गई।
मिल बन्द होने के बाद इसका प्रकरण भारत सरकार के औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड ( बोर्ड फार इण्डस्ट्रीयल एण्ड फाइनेंशियल रिकंस्ट्रक्शन-बीआईएफआर) के समक्ष प्रस्तुत हुआ। मिल को पुनर्जीवित करने के लिए दो बार अलग अलग योजनाएं प्रस्तुत की गई लेकिन दोनो बार ही इन योजनाओं को अस्वीकृत कर दिया गया।

हमने भूमि का कब्जा नहीं दिया है।

हाईकोर्ट के लिक्वीडेटर मिल की संपत्ति का कब्जा लेने आए थे। चूंकि भूमि प्रदेश सरकार के अधीन है। इसलिए हमने भूमि का कब्जा नहीं दिया है।

एमएल आर्य, एडीएम, रतलाम।