व्यक्ति स्वयं के कर्मो को बंध तीन प्रकार से कम करता है, पहला स्वयं आत्म अवलोकन से अपने दोषों को देखता है व निंदा करता है। दूसरा वह गुरूजनों के सामने अपने दोषों को प्रकट कर आलोचना करता है, अथवा सबके सामने समाज के बीच में अपने दोषों को उजागर कर उसकी आलोचना करता है। अपने कर्मो के क्षय के लिए आलोचना करना आलोचना की कार्यशैली पराक्रम सम्यकत्व आत्मा ही कर सकती है। ये विचार महासती सुशिलाकंवर महाराज ने महत्ती धर्मसभा में समता भवन में व्यक्त किए। महासती समीक्षणाश्री ने भी धर्मसभा को संबोधित किया। चंदनमल छाजेड, सुदर्शन पिरेादिया, महेन्द्र गादिया ने बताया कि समता भवन नौलाईपुरा पर प्रतिदिन प्रवचन चल रहे है। मोनिका संजय बम्बोरी ने 22 के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।