
Paytm का काम तमाम करने आ रहा है Whatsapp का ये पेमेंट सर्विस
फेक न्यूज ने सबकी सांसें फुला रखी हैं। बच्चों के अपहरण की शेयर होने वाली झूठी खबरों के कारण भीड़ के हमलों में एक वर्ष के दौरान करीब 29 लोगों की जान जा चुकी है। इंडिया टुडे की वायरल टेस्ट टीम ने इस खतरनाक चलन की पड़ताल की तो उन बातों का पता चला जिनसे अफवाहें वायरल होती हैं।
1. फेक मैसेज का फैलना
वाट्सएप ग्रुप्स गलत, अधूरी या भ्रामक जानकारी का सबसे बड़े जरिया हैं और किसी को अंदाजा भी नहीं होता कि इसके परिणाम कितने गंभीर हो सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि पैरेंट्स और स्कूलों के ग्रुप्स पर जब बच्चों के अपहरण की अफवाहें शेयर होती हैं तो अधिकतर लोग इन पर भरोसा कर लेते हैं। दूसरे नंबर पर फेसबुक पोस्ट हैं जहां लोग फॉरवार्डेड एज रिसिव्ड लिखकर आगे बढ़ा देते हैं। कुछ लोग इनके साथ सावधान करने वाले कैप्शन लिखकर शेयर कर देते हैं।
2. सामग्री का स्वरूप
अधिकतर सूचनाएं वीडियो, सीसीटीवी की फुटेज या इसकी तस्वीरों के रूप में होती हैं। विजुअल्स से लोग इन पर भरोसा कर लेते हैं। वीभत्स वीडियो भी कॉमन हैं। इनके साथ आगाह करने वाली पंक्तियां भी होती हैं। साथ में लोकेशन के रूप में शहर या कस्बे का भी नाम होता है जिससे ये सही व अपने शहर की लगती है। बच्चों के अपहरण को लेकर एक वीडियो वायरल हुआ था जो कि असल में जागरुकता लाने के लिए कराची (पाकिस्तान) के एक एनजीओ ने बनाया था।
3. फिल्टर क्यों नहीं
सच्चाई गूगल पर भी जानी जा सकती है तो लोग ऐसा करते क्यों नहीं हैं? मनोचिकित्सक श्वेतांक बंसल कहते हैं कि लोगों के मन में कई धारणाएं होती हैं और जब भी इनकी पुष्टि करने वाली सूचनाएं मिलती हैं तो वे इन्हें सच मान लेते हैं। फिर यदि किसी हस्ती ने बयान दे दिया या मीडिया ने लोगों की धारणाओं से मिलती-जुलती न्यूज रिपोर्ट दे दी तो ये अफवाहें तेजी से फैलती हैं। ये बयान सोशल मीडिया पर लोग समाजसेवा मानकर शेयर करते हैं और उन्हें अदाजा भी नहीं होता कि क्या गलत कर दिया।
ये लोग फैलाते हैं
दिल्ली पुलिस को ट्रेनिंग देने वाली जयंती दत्ता के अनुसार इन फेक मैसेजों के पीछे कुछ ऐसे लोग होते हैं जिन्हें अपनी बनाई चीजें ज्यादा से ज्यादा शेयर व चर्चित होने से खुद को श्रेय देने की संतुष्टि पूरी होती है। जब इनके मैसेजों को हजारों-लाखों हिट मिलते हैं तो इन्हें एक अलग तरह की किक फील होती है। यह स्यूडो ग्रेंडियोस्टी मनोविकार होता है जिससे ग्रसित व्यक्ति इसके दुष्परिणामों या इसके शिकार लोगों के बारे में बिलकुल भी नहीं सोचता है।
दूसरी श्रेणी में वे हैं जो राजनीतिक या सामाजिक कारणों से झूठी सूचनाएं फैलाते हैं। ये इन मैसेज के जरिये अपनी विचारधारा फैलाने या फिर किसी विशेष वर्ग के लोगों को निशाना बनाने के मंसूबे रखते हैं। ये लोग भ्रामक या झूठे वीडियो-तस्वीरें फर्जी सोशल मीडिया आइडी से बनाते हैं। दुखद पहलू है कि भीड़ के निशाने पर वे लोग आते हैं जो स्थानीय लोगों से अलग दिखते, दूसरी भाषा बोलते हैं, जिनका रहन-सहन, पहनावा या उच्चारण भिन्न होता है। जहां अफवाहों का जोर होता है उन इलाकों में अकेले व्यक्ति की तुलना में 3-5 लोगों के समूह वाले लोगों को सबसे ज्यादा संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
Published on:
16 Jul 2018 04:50 pm
बड़ी खबरें
View Allरिलेशनशिप
लाइफस्टाइल
ट्रेंडिंग
स्वास्थ्य
